Flexi-Cap Funds का जलवा! Large-Cap Funds को 10 साल से दे रहे हैं मात, जानें क्यों?

MUTUAL-FUNDS
Whalesbook Logo
AuthorNeha Patil|Published at:
Flexi-Cap Funds का जलवा! Large-Cap Funds को 10 साल से दे रहे हैं मात, जानें क्यों?

बाजार के जानकारों के लिए एक बड़ी खबर सामने आई है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक, Flexi-Cap Mutual Funds ने लगातार पिछले तीन, पांच और दस सालों में Large-Cap Funds को बेहतरीन रिटर्न दिया है।

क्या है वजह?

Flexi-Cap Funds की इस शानदार परफॉर्मेंस का मुख्य कारण है इनका निवेश का तरीका। जहां Large-Cap Funds सिर्फ मार्केट कैप के हिसाब से टॉप 100 कंपनियों में निवेश करते हैं, वहीं Flexi-Cap Funds को यह आजादी होती है कि वे लार्ज, मिड और स्मॉल-कैप शेयरों में कहीं भी निवेश कर सकते हैं। इसी लचीलेपन (Flexibility) की वजह से ये फंड्स बाजार में तेजी के दौरान अच्छी कमाई कर पाते हैं। Value Research के आंकड़ों के अनुसार, 10 साल की अवधि में यह अंतर और भी साफ नजर आता है।

फंड्स के नियम अलग

इन दोनों तरह के फंड्स के नियमों में भी बड़ा अंतर है। SEBI के नियमों के मुताबिक, Large-Cap Funds को अपने कुल एसेट्स (Assets) का कम से कम 80% हिस्सा टॉप 100 कंपनियों में लगाना होता है। इससे इन फंड्स में स्टेबिलिटी बनी रहती है। वहीं, Flexi-Cap Funds को इक्विटी में कम से कम 65% का निवेश करना होता है, लेकिन ये किसी भी मार्केट कैप सेगमेंट में कर सकते हैं। इसका मतलब है कि फंड मैनेजर ग्रोथ के मौके देखकर मिड और स्मॉल-कैप शेयरों में पैसा लगा सकते हैं, या बाजार के जोखिम को देखकर लार्ज-कैप में वापस आ सकते हैं।

परफॉर्मेंस में उतार-चढ़ाव क्यों?

Flexi-Cap Funds का हालिया बेहतर प्रदर्शन मिड और स्मॉल-कैप इंडेक्स में आई तेजी से जुड़ा है। जब पूरा बाजार ऊपर जाता है, तो छोटी कंपनियों में निवेश करने वाले फंड्स अक्सर लार्ज-कैप फंड्स से ज्यादा रिटर्न देते हैं। लेकिन, यह भी समझना जरूरी है कि यह एकतरफा रास्ता नहीं है। जिस लचीलेपन के कारण ये फंड्स ज्यादा कमाई कर पाते हैं, उसी कारण ये ज्यादा वोलेटाइल (Volatile) भी हो सकते हैं। छोटी और ज्यादा वोलेटाइल कंपनियों में निवेश होने के कारण, बाजार में गिरावट आने पर ये Large-Cap Funds की तुलना में ज्यादा टूट सकते हैं।

जोखिम और रिटर्न का खेल

निवेशकों को यह समझना चाहिए कि Flexi-Cap Funds सिर्फ इसलिए Large-Cap Funds से 'बेहतर' नहीं हैं, बल्कि उनका रिस्क प्रोफाइल (Risk Profile) अलग है। Large-Cap Funds अपने कम वोलेटाइल होने के कारण कई पोर्टफोलियो के लिए एक मुख्य आधार (Core Holding) होते हैं, भले ही उनका रिटर्न थोड़ा कम हो। दूसरी ओर, Flexi-Cap Funds मिड और स्मॉल-कैप सेगमेंट में जाकर ज्यादा जोखिम उठाते हैं। इसलिए, इन दोनों के बीच चुनाव निवेशक की अपनी रिस्क लेने की क्षमता और पोर्टफोलियो के लक्ष्य पर निर्भर करता है। दोनों को मिलाकर एक संतुलित पोर्टफोलियो बनाया जा सकता है।

निवेशकों को क्या देखना चाहिए?

फंड्स का मूल्यांकन करते समय सिर्फ परफॉर्मेंस ही काफी नहीं है। निवेशकों को फंड के एक्सपेंस रेशियो (Expense Ratio) पर भी नजर रखनी चाहिए, क्योंकि ज्यादा खर्च लंबे समय में रिटर्न को कम कर सकता है। फंड मैनेजर कितनी बार स्टॉक खरीदता-बेचता है, इसका पता लगाने के लिए पोर्टफोलियो टर्नओवर रेशियो (Portfolio Turnover Ratio) की भी निगरानी करना उपयोगी है। बहुत ज्यादा टर्नओवर एक आक्रामक रणनीति का संकेत दे सकता है, जिससे ट्रांजैक्शन कॉस्ट बढ़ सकती है। अंत में, फंड मैनेजर की रणनीति का विभिन्न मार्केट साइकल्स में लगातार प्रदर्शन देखना भी जरूरी है, क्योंकि इन फंड्स का लचीलापन फंड मैनेजर की सही समय पर निवेश करने की क्षमता पर बहुत निर्भर करता है।

Disclaimer:This article is published for informational purposes only. While reasonable efforts are made to ensure accuracy, completeness, and timeliness, readers are encouraged to independently verify information before making any decisions based on the content. The views and information presented are subject to editorial review and may be updated without notice.