13 फ्लेक्सी-कैप म्यूचुअल फंड्स (Flexi-cap Mutual Funds) की हालिया स्टडी बताती है कि सिर्फ लंबा समय बिता देना ही वेल्थ क्रिएशन की गारंटी नहीं है। निवेश किए गए **₹1 लाख** का रिटर्न **₹1.98 करोड़** तक पहुंचा, लेकिन सभी फंड्स का प्रदर्शन अलग-अलग रहा। निवेशकों को फंड की उम्र के बजाय कंपाउंडिंग और मार्केट साइकिल पर ध्यान देना चाहिए।
भारतीय शेयर बाजार में दशकों तक निवेशित रहना वेल्थ बनाने का सबसे भरोसेमंद तरीका है। हालांकि, 13 फ्लेक्सी-कैप फंड्स के विश्लेषण से पता चला है कि केवल पुरानी स्कीम होना ही सफलता की कुंजी नहीं है। असल खेल 'कंपाउंडिंग रेट' या 'इंटरनल रेट ऑफ रिटर्न' का है। 1990 के दशक में शुरू हुए फंड्स को बढ़ने का अधिक समय मिला, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उन्होंने नई स्कीम्स से बेहतर प्रदर्शन किया है।
मुनाफे में बड़ा अंतर
रिटर्न का अंतर काफी चौंकाने वाला है। उदाहरण के लिए, HDFC Flexi Cap Fund में शुरुआत से निवेश किए गए ₹1 लाख बढ़कर करीब ₹1.98 करोड़ हो गए। वहीं, इसी अवधि में Aditya Birla Sun Life Flexi Cap Fund में यह रकम करीब ₹1.89 करोड़ और Franklin India Flexi Cap Fund में ₹1.52 करोड़ रही। वहीं, 1994 में शुरू हुआ Taurus Flexi Cap Fund यह साबित करता है कि पुरानी होने के बावजूद अगर ग्रोथ रेट स्थिर न हो, तो फंड का रिटर्न कम हो सकता है। इसलिए बेंचमार्क से ऊपर 'अल्फा' (Alpha) जनरेट करने वाला फंड चुनना सबसे जरूरी है।
फ्लेक्सिबिलिटी का फायदा और रिस्क
फ्लेक्सी-कैप फंड्स का सबसे बड़ा प्लस पॉइंट यह है कि वे लार्ज, मिड और स्मॉल-कैप के बीच अपना एलोकेशन बदल सकते हैं। SEBI के नियमों के मुताबिक, इन फंड्स को कम से कम 65% पैसा इक्विटी में लगाना होता है। यह आजादी फंड मैनेजर को मार्केट के हिसाब से सही शेयर चुनने का मौका देती है, लेकिन यह रिस्क भी है। अगर एलोकेशन गलत हो गया, तो रिटर्न पर बुरा असर पड़ सकता है।
SIP की ताकत और मार्केट साइकल
SIP के जरिए निवेश करने से निवेशकों को मार्केट की अस्थिरता (Volatility) से निपटने में मदद मिलती है। HDFC Flexi Cap Fund ने 20% से अधिक का SIP XIRR दिया है। समय-समय पर निवेश जारी रखने से एक बड़ी पूंजी तैयार हो सकती है, जो फंड के केस में ₹20 करोड़ से भी अधिक हो सकती है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
फंड चुनते समय सिर्फ ऐतिहासिक रिटर्न न देखें। एक्सपेंस रेश्यो (Expense Ratio), फंड मैनेजर में बदलाव और फंड की रिस्क प्रोफाइल पर भी नजर रखें। भविष्य का रिटर्न इस बात पर निर्भर करेगा कि फंड मैनेजर बदलती आर्थिक परिस्थितियों में कैसे स्टॉक्स चुनता है और गिरावट के दौर में रिस्क को कैसे मैनेज करता है।
