FY27 में MF टैक्स का जटिल जाल
आने वाले फाइनेंशियल ईयर 2026-27 (FY27) के लिए भारत में म्यूचुअल फंड (MF) टैक्स का ढांचा, पिछले कुछ सालों से चली आ रही जटिलताओं से थोड़ी राहत मिलने की उम्मीद कम है। अब यह नए नियमों के बदलावों का दौर नहीं, बल्कि हाल के वर्षों में लागू की गई नीतियों के गहरे असर का समय है। खासकर, डेट फंड (Debt Fund) टैक्स में हुए बड़े बदलावों ने निवेशकों की रणनीति को पूरी तरह बदल दिया है।
डेट फंड्स (Debt Funds) में बड़ा बदलाव
निवेशकों के व्यवहार पर सबसे गहरा असर 1 अप्रैल, 2023 से लागू डेट म्यूचुअल फंड टैक्स नियमों से पड़ा है। इस तारीख के बाद किए गए निवेश पर, होल्डिंग पीरियड (कितने समय तक निवेश रखा) की परवाह किए बिना, निवेशक की लागू इनकम टैक्स स्लैब दर से टैक्स लगेगा। इसका मतलब है कि पहले मिलने वाला लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन (LTCG) का फायदा और इंडक्सेशन (Indexation) का लाभ खत्म हो गया है। यह बदलाव डेट फंड के टैक्स नियमों को बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) के समान ले आया है। ऐसे में, जो निवेशक टैक्स के मामले में सुरक्षित माने जाने वाले डेट इंस्ट्रूमेंट्स पर भरोसा करते थे, उन्हें अब अपने एसेट एलोकेशन पर फिर से सोचना होगा। वे या तो शेयर-आधारित (Equity) इंस्ट्रूमेंट्स की ओर जा सकते हैं या फिर पारंपरिक फिक्स्ड-इनकम प्रोडक्ट्स चुन सकते हैं, जिनके अपने टैक्स नियम हैं। 1 अप्रैल, 2023 से पहले किए गए निवेशों के लिए कुछ पुराने टैक्स नियमों का पालन हो सकता है, लेकिन कुल मिलाकर डेट इंस्ट्रूमेंट्स के टैक्स फायदे कम हो गए हैं।
शेयर-आधारित फंड्स (Equity Funds): टैक्स के साथ रणनीति
शेयर-आधारित म्यूचुअल फंड, जिनमें कम से कम 65% निवेश घरेलू शेयरों में होता है, का टैक्स ढांचा थोड़ा अलग है। 12 महीने से ज़्यादा समय तक रखे गए यूनिट्स पर लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन (LTCG) पर, सालाना ₹1.25 लाख तक के मुनाफे पर कोई टैक्स नहीं लगेगा। इस सीमा से ज़्यादा के मुनाफे पर 12.5% टैक्स लगता है। वहीं, 12 महीने या उससे कम समय के लिए रखे गए यूनिट्स पर शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन (STCG) पर 20% का ज़्यादा टैक्स लगेगा। (यूनियन बजट 2024 में STCG रेट 15% से बढ़ाकर 20% किया गया था, ताकि सट्टेबाजी को हतोत्साहित किया जा सके)। 31 जनवरी, 2018 तक के जमा हुए मुनाफे पर एक 'ग्रैंडफादरिंग' प्रावधान लागू है, जो LTCG टैक्स से छूट देता है। इक्विटी-लिंक्ड सेविंग्स स्कीम्स (ELSS) अभी भी पुराने टैक्स रिजीम के तहत सेक्शन 80C के तहत ₹1.5 लाख तक की अतिरिक्त कटौती के साथ उपयोगी हैं, और इन पर भी मानक शेयर LTCG टैक्स लागू होता है।
हाइब्रिड फंड्स, REITs, और अन्य: बारीकियों को समझें
हाइब्रिड फंड्स की टैक्सिंग उनके निवेश के आधार पर निर्भर करती है। 65% या उससे ज़्यादा शेयर एक्सपोजर वाले फंड को शेयर-आधारित फंड माना जाता है। दूसरी ओर, 35% से कम शेयर एक्सपोजर वाले फंड डेट फंड के नियमों के तहत आते हैं। 35% से 65% के बीच शेयर एलोकेशन वाले फंड का टैक्स ट्रीटमेंट मिश्रित होता है। रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स (REITs) और इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स (InvITs) भी, हालांकि ये बिज़नेस ट्रस्ट हैं, शेयर टैक्स नियमों के करीब आते हैं। लिस्टेड यूनिट्स को 12 महीने से ज़्यादा रखने पर ₹1.25 लाख से ज़्यादा के LTCG पर 12.5% टैक्स लगता है, जबकि कम अवधि के गेन पर 20% टैक्स लगता है। 65% से कम घरेलू शेयर में निवेश करने वाले फंड, जैसे गोल्ड ईटीएफ (Gold ETF) और अंतर्राष्ट्रीय फंड (International Funds), आम तौर पर डेट-जैसे या खास एसेट क्लास के टैक्स नियमों का पालन करते हैं।
जटिलता से बढ़ता है जोखिम
यह जटिल टैक्स ढांचा अनजाने निवेशकों के लिए बड़ा जोखिम पैदा करता है। फंड के प्रकार, खरीदने की तारीख और होल्डिंग पीरियड के आधार पर अलग-अलग नियमों के कारण गलतियों की संभावना बढ़ जाती है, जिससे अनचाहे टैक्स देनदारियां पैदा हो सकती हैं। नॉन-रेजिडेंट इंडियंस (NRIs) के लिए, विदेशी टैक्स अथॉरिटीज़, जैसे IRS, द्वारा भारतीय म्यूचुअल फंड को पैसिव फॉरेन इन्वेस्टमेंट कंपनीज़ (PFICs) के रूप में वर्गीकृत करने पर, भारी टैक्स दरें और जुर्माना लग सकता है, जिससे घरेलू टैक्स के फायदे खत्म हो सकते हैं। इसके अलावा, कई डेट-ओरिएंटेड और हाइब्रिड इंस्ट्रूमेंट्स के लिए इंडक्सेशन लाभों को हटाए जाने से, निवेशकों को ज़्यादा जोखिम वाले शेयर एसेट्स की ओर या पारंपरिक बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट की ओर बढ़ाया जा सकता है, जो कैपिटल एलोकेशन को बिगाड़ सकता है और बाज़ार की अस्थिरता को बढ़ा सकता है।
भविष्य का नज़रिया: सरलीकरण की मांग
एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया (AMFI) जैसी इंडस्ट्री बॉडीज़ ने बजट 2026 से पहले की अपनी प्रस्तुतियों में टैक्स सुधारों की जोरदार वकालत की है। प्रमुख प्रस्तावों में 36 महीने से ज़्यादा रखे गए डेट फंड के लिए इंडक्सेशन लाभों को 12.5% की दर से बहाल करना, और शेयर फंड के लिए टैक्स-फ्री LTCG एग्ज़ेम्पशन को ₹1.25 लाख से बढ़ाकर ₹2 लाख करना शामिल है। लंबी अवधि के डेट निवेशों के लिए एक समर्पित टैक्स-सेविंग स्कीम, 'न्यू डेट लिंक्ड सेविंग्स स्कीम (DLSS)', जिसमें 5 साल का लॉक-इन हो, पेश करने की भी मांग है। इंडस्ट्री कैपिटल मार्केट में लगातार लंबी अवधि की भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए अधिक स्पष्टता और निष्पक्षता चाहती है, क्योंकि टैक्स एफिशिएंसी कम्पाउंडिंग रिटर्न का एक महत्वपूर्ण, लेकिन अक्सर अनदेखा किया जाने वाला, ड्राइवर बनी हुई है।