अक्सर निवेशक कुछ तिमाहियों तक कम रिटर्न देखकर अपना Mutual Fund बेचने की गलती कर बैठते हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि शॉर्ट-टर्म उतार-चढ़ाव सामान्य है और आपको **3 से 5 साल** के नजरिए से ही प्रदर्शन को आंकना चाहिए, ताकि बेवजह टैक्स और एग्जिट लोड से बचा जा सके।
जब कोई Mutual Fund अपने बेंचमार्क के मुकाबले कमजोर प्रदर्शन करने लगता है, तो निवेशक के सामने सबसे बड़ा सवाल यह होता है कि क्या अभी बाहर निकल जाना सही है? कुछ तिमाहियों के खराब आंकड़ों को देखकर घबराहट में फैसला लेना एक आम मानवीय प्रवृति है, लेकिन लॉन्ग-टर्म वेल्थ क्रिएशन में यह अक्सर नुकसानदेह साबित होता है।
शॉर्ट-टर्म बेंचमार्किंग का जाल
ज्यादातर निवेशक सिर्फ 1 साल के प्रदर्शन के आधार पर फंड को खराब मान लेते हैं। बाजार के एक्सपर्ट्स के मुताबिक, यह एक बड़ी गलती है। बाजार का मिजाज समय के साथ बदलता रहता है और एक सेक्टर आज लीडर हो सकता है तो कल पीछे। किसी भी फंड मैनेजर की काबिलियत को परखने के लिए 3 से 5 साल की अवधि का डेटा देखना ही समझदारी है।
मार्केट की गिरावट बनाम फंड की विफलता
यह समझना जरूरी है कि फंड का प्रदर्शन खराब क्यों है। अगर उसी कैटेगरी के दूसरे फंड्स भी संघर्ष कर रहे हैं, तो इसका मतलब है कि यह मार्केट की स्थिति का असर है, न कि फंड मैनेजर की कमी। वहीं, अगर फंड लगातार अपने साथियों से पीछे चल रहा है, तो आपको फंड मैनेजर के बदलाव या स्कीम के रिस्क प्रोफाइल में आए बदलावों की जांच करनी चाहिए।
स्विचिंग की छिपी हुई लागत
नया 'स्टार' फंड खरीदने की होड़ में निवेशक अक्सर दो बड़ी गलतियां करते हैं:
- एग्जिट लोड: तय समय से पहले पैसा निकालने पर आपको 1% से 3% तक का जुर्माना देना पड़ सकता है।
- टैक्स: भारत में एक फंड से दूसरे फंड में स्विच करना रिडेम्पशन माना जाता है, जिस पर आपको कैपिटल गेन्स टैक्स देना पड़ता है।
निष्कर्ष यही है कि बाहर निकलने का फैसला केवल तभी लें जब फंड आपकी एसेट एलोकेशन की जरूरत को पूरा न कर रहा हो। बिना सोचे-समझे फंड बदलने से पोर्टफोलियो की क्वालिटी सुधरने के बजाय सिर्फ आपका टैक्स बोझ बढ़ता है।
