इक्विटी बनाम हाइब्रिड फंड: ₹7 लाख के निवेश में 10 साल में कितना बड़ा अंतर?

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AuthorAditya Rao|Published at:
इक्विटी बनाम हाइब्रिड फंड: ₹7 लाख के निवेश में 10 साल में कितना बड़ा अंतर?

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लंबे समय के लिए पैसा निवेश करने की सोच रहे हैं? इक्विटी और हाइब्रिड फंड में ₹7 लाख का निवेश 10 साल में कितना अलग रिटर्न दे सकता है, इसकी एक सीधी तुलना सामने आई है। इक्विटी फंड जहां ज्यादा ग्रोथ का मौका देते हैं, वहीं उनमें बाजार का जोखिम भी हाइब्रिड फंड के मुकाबले कहीं ज्यादा होता है।

क्या हुआ?

भारतीय निवेशकों के लिए यह समझना ज़रूरी है कि लंबी अवधि में धन बनाने के लिए इक्विटी (Equity) और हाइब्रिड (Hybrid) म्यूचुअल फंड में से किसे चुनें। हाल के एक विश्लेषण में, ₹7 लाख के एकमुश्त निवेश (lump sum investment) को 10 साल के लिए इन दोनों कैटेगरी में रखकर देखा गया।

  • इक्विटी फंड: अगर इक्विटी फंड से सालाना औसतन 12% का रिटर्न मिले, तो ₹7 लाख का निवेश करीब ₹21.74 लाख तक पहुंच सकता है।
  • हाइब्रिड फंड: वहीं, हाइब्रिड फंड से सालाना औसतन 10% रिटर्न मानने पर, यह रकम करीब ₹18.15 लाख हो सकती है।

इस तरह, एक दशक में दोनों के बीच लगभग ₹3.6 लाख का बड़ा अंतर देखने को मिलता है।

एसेट एलोकेशन का रोल

रिटर्न में इस अंतर की मुख्य वजह इन फंडों का पैसा लगाने का तरीका है। इक्विटी फंड सीधे तौर पर लिस्टेड कंपनियों के शेयरों में निवेश करते हैं। शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव का सीधा असर इन पर पड़ता है। जब बाजार अच्छा करता है, तो ये फंड तगड़ा रिटर्न दे सकते हैं, लेकिन बाजार गिरने पर इनमें भारी गिरावट भी आ सकती है।

दूसरी ओर, हाइब्रिड फंड एक संतुलित तरीका अपनाते हैं। ये इक्विटी (शेयर) और डेट (बॉन्ड) दोनों में पैसा लगाते हैं। बॉन्ड जैसी स्थिर इंस्ट्रूमेंट्स को शामिल करने से, ये फंड बाजार गिरने पर कुछ हद तक सुरक्षा प्रदान करने की कोशिश करते हैं। इसका मकसद शेयरों से ग्रोथ का फायदा उठाना और बॉन्ड की स्थिरता से कुल जोखिम को मैनेज करना है। इसी वजह से हाइब्रिड फंड का रिटर्न प्रोफाइल प्योर इक्विटी स्कीम से अलग होता है।

जोखिम और रिटर्न का खेल

निवेशकों के लिए इन दोनों कैटेगरी के बीच का चुनाव अक्सर सिर्फ संभावित रिटर्न पर नहीं, बल्कि जोखिम सहने की क्षमता पर भी निर्भर करता है। इक्विटी फंड उन निवेशकों के लिए बेहतर माने जाते हैं जिनका निवेश का समय लंबा है और जो बाजार के उतार-चढ़ाव के बावजूद बने रह सकते हैं। इनमें मिलने वाला ज़्यादा रिटर्न, ज़्यादा अस्थिरता (volatility) और बाजार में गिरावट के दौरान पूंजी खोने के जोखिम का हर्जाना होता है।

हाइब्रिड फंड को अक्सर बीच का रास्ता माना जाता है। इन्हें वे निवेशक चुनते हैं जो इक्विटी बाजार में हिस्सेदारी तो चाहते हैं, लेकिन प्योर स्टॉक पोर्टफोलियो की पूरी अस्थिरता से असहज महसूस करते हैं। हालांकि, यह याद रखना ज़रूरी है कि ये रिटर्न के आंकड़े अनुमानित हैं। असली परफॉरमेंस बाजार की हालत, फंड मैनेजर की रणनीति और फंड की कैटेगरी (जैसे लार्ज-कैप, मिड-कैप या एग्रेसिव हाइब्रिड) पर निर्भर करेगी।

निवेशकों के लिए ज़रूरी बातें

रिटर्न और जोखिम के अलावा, निवेशकों को कुछ और बातों पर भी ध्यान देना चाहिए:

  1. बाजार की गारंटी नहीं: किसी भी निवेश पर रिटर्न की गारंटी कभी नहीं होती, और पिछला प्रदर्शन भविष्य के नतीजों की निशानी नहीं है। 10 साल का समय काफी लंबा होता है, लेकिन इसमें बाजार की तेज़ी और मंदी, दोनों तरह के दौर शामिल हो सकते हैं।
  2. टैक्स का असर: भारतीय टैक्स कानूनों के तहत इक्विटी और हाइब्रिड फंड के डेट हिस्से पर टैक्स अलग-अलग लगता है। इसलिए, किसी भी निवेश पर टैक्स के बाद मिलने वाले रिटर्न का मूल्यांकन करना चाहिए, क्योंकि वही असली रकम होती है जो निवेशक की जेब में आती है।
  3. व्यक्तिगत लक्ष्य: हर निवेशक के वित्तीय लक्ष्य और निवेश की समय-सीमा अलग-अलग होती है। जो एक व्यक्ति के लिए सही है, वह दूसरे के लिए नहीं हो सकता। इसलिए, अपने निवेश को अपनी ज़रूरतों और जोखिम झेलने की क्षमता के अनुसार ही चुनें।

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Disclaimer:This article is published for informational purposes only. While reasonable efforts are made to ensure accuracy, completeness, and timeliness, readers are encouraged to independently verify information before making any decisions based on the content. The views and information presented are subject to editorial review and may be updated without notice.