DSP Mutual Fund की एक नई रिपोर्ट ने निवेश जगत में हलचल मचा दी है। Sensex का **15.2%** का लॉन्ग-टर्म रिटर्न केवल एक मंजिल है, न कि हर साल मिलने वाला फिक्स्ड रिटर्न। चूंकि मात्र **13.3%** साल ही इस औसत के करीब रहे हैं, इसलिए निवेशकों को शॉर्ट-टर्म उतार-चढ़ाव से घबराने के बजाय लॉन्ग-टर्म गोल्स पर फोकस करना चाहिए।
औसत रिटर्न का भ्रम
ज्यादातर निवेशक अपना फाइनेंशियल प्लान 15% के सालाना रिटर्न को ध्यान में रखकर बनाते हैं। लेकिन DSP Mutual Fund की 'नेविगेटर रिपोर्ट' (1980 से 2025) बताती है कि यह आंकड़ा दशकों की यात्रा को तो दर्शाता है, लेकिन किसी एक कैलेंडर ईयर के लिए यह बिल्कुल भ्रामक है। हकीकत में, 1981 से अब तक केवल 13.3% साल ही ऐसे रहे हैं, जिनमें रिटर्न उस लॉन्ग-टर्म औसत के 3% दायरे में रहा है।
बाजार के extremes को समझें
इक्विटी मार्केट में स्मूथ ग्रोथ नहीं, बल्कि चरम उतार-चढ़ाव होते हैं। डेटा के मुताबिक, कई साल ऐसे रहे हैं जब नुकसान 20% से ज्यादा रहा, तो वहीं कुछ साल ऐसे भी आए जब रिटर्न 60% के पार निकल गया। अगर आप लॉन्ग-टर्म औसत को आधार मानकर अगले साल के रिटर्न का अनुमान लगाते हैं, तो यह आपको गलत फैसले लेने पर मजबूर कर सकता है।
क्यों शॉर्ट-टर्म फोरकास्टिंग है खतरनाक?
इतिहास गवाह है कि मार्केट 2008 में भारी गिरावट और 2009 में जोरदार रिकवरी जैसी चालें दिखा चुका है। जो निवेशक सिर्फ एक साल की परफॉरमेंस देखकर घबरा जाते हैं, वे अक्सर गलत समय पर बाजार से बाहर निकल जाते हैं। एक समझदार निवेशक वही है जो जानता है कि निवेश की यात्रा कभी सीधी लकीर नहीं होती।
निवेशकों के लिए सबक
अपने लॉन्ग-टर्म लक्ष्यों को शोर-शराबे से अलग रखें। अगर किसी साल रिटर्न आपके अनुमान से कम रहता है, तो वह विफलता नहीं बल्कि इक्विटी निवेश का स्वभाव है। अपनी रणनीति पर टिके रहना और मार्केट की अस्थिरता को सहना ही वेल्थ क्रिएशन का असली मंत्र है।
