बाजार की अस्थिरता (Volatility) से घबराकर भारतीय निवेशकों ने सितंबर तिमाही में इक्विटी म्यूचुअल फंड से **₹1.25 लाख करोड़** बाहर निकाले हैं। विदेशी बिकवाली और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के कारण Nifty 50 में **5%** की गिरावट आई है, जिसने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है।
सितंबर तिमाही के दौरान बाजार में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला, जिसका सीधा असर म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री पर पड़ा। पिछली तिमाही के ₹1.05 लाख करोड़ के मुकाबले इस बार रिडेम्पशन में 19% का इजाफा हुआ है।
बाजार पर दबाव और इंडेक्स का हाल
इस तिमाही के दौरान Nifty 50 में 5% की गिरावट दर्ज की गई। सितंबर का महीना बेंचमार्क इंडेक्स के लिए काफी कमजोर रहा। Sensex जो जून के अंत में 76,478 अंक पर था, वह तिमाही के अंत तक गिरकर 72,480 अंकों पर आ गया।
रिडेम्पशन का गणित
बाजार में इस बिकवाली के पीछे विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की नेट बिकवाली और बढ़ते क्रूड ऑयल के दाम मुख्य कारण रहे। रिस्क के चलते मिड-कैप और स्मॉल-कैप फंड्स पर भी दबाव दिखा:
- मिड-कैप फंड्स: रिडेम्पशन 14% बढ़कर ₹12,544 करोड़ रहा।
- स्मॉल-कैप फंड्स: रिडेम्पशन 3% बढ़कर ₹12,499 करोड़ पहुंच गया।
क्या SIP है निवेशकों का ढाल?
हालांकि निवेशकों ने पैसा निकाला है, लेकिन पूरी तरह से बाजार से निकासी नहीं हुई है। SIP (सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान) के जरिए निवेश जारी है, जो बाजार के लिए एक 'कुशन' की तरह काम कर रहा है। चूंकि SIP निवेशक छोटे अंतराल पर निवेश करते हैं, इसलिए बाजार की फौरी हलचल का उन पर असर कम होता है।
अब सबकी नजरें इस पर टिकी हैं कि विदेशी फंड्स का रुख क्या रहता है और कच्चे तेल की कीमतें कब स्थिर होती हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि लंबे समय के लक्ष्य रखने वाले निवेशकों को घबराने के बजाय अपने रिस्क प्रोफाइल की समीक्षा करनी चाहिए।
