इक्विटी फंड्स में बड़ी दरार: 20% मुनाफे और 10% नुकसान के बीच बंटे निवेशकों के पैसे

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AuthorAditya Rao|Published at:
इक्विटी फंड्स में बड़ी दरार: 20% मुनाफे और 10% नुकसान के बीच बंटे निवेशकों के पैसे

पिछले दो सालों में इक्विटी म्यूचुअल फंड्स के रिटर्न में 30% का भारी अंतर देखने को मिला है, जबकि निफ्टी 50 लगभग सपाट रहा। यह दिखाता है कि बाज़ार में सक्रिय स्टॉक चुनने और अनुशासित SIPs ने कैसे बड़ा रोल निभाया, खासकर तब जब सेक्टरों का नेतृत्व लगातार बदल रहा था।

बाज़ार का हाल: निफ्टी सपाट, पर फंड्स का रिटर्न अलग-अलग

अगस्त 2026 को समाप्त हुए पिछले दो सालों के आंकड़े भारतीय निवेशकों के लिए एक चौंकाने वाली हकीकत बताते हैं। जहां एक ओर निफ्टी 50 इंडेक्स ने सिर्फ 0.4% का सालाना रिटर्न दिया, वहीं दूसरी ओर म्यूचुअल फंड पोर्टफोलियो में नतीजों का बड़ा अंतर दिखा। कुछ फंड्स ने 10% का नुकसान दर्ज किया, जबकि कुछ 20% तक का तगड़ा रिटर्न देने में कामयाब रहे। यह 30% का अंतर साफ करता है कि एक स्थिर बाज़ार में, पैसे बनाने और गंवाने के बीच की रेखा पोर्टफोलियो मैनेजमेंट में छिपी है, न कि सिर्फ इंडेक्स की चाल में।

क्यों ज़रूरी था एक्टिव स्टॉक पिकिंग?

बीते कुछ समय से बाज़ार में लीडरशिप में तेजी से बदलाव देखे गए हैं। एक सेक्टर में उछाल आता, तो दूसरा सेक्टर नीचे चला जाता। ऐसे में पैसिव, इंडेक्स-ट्रैकिंग स्ट्रेटेजी के लिए बने रहना मुश्किल हो गया। विश्लेषण किए गए 449 एक्टिव इक्विटी म्यूचुअल फंड स्कीम्स में से, केवल लगभग 52% ही अपने बेंचमार्क को लगातार हरा पाए। यह सफलता दर कैटेगरी के हिसाब से अलग थी। मल्टी-कैप और फ्लेक्सी-कैप स्कीम्स में अतिरिक्त रिटर्न जेनरेट करने की क्षमता ज़्यादा दिखी, जो 67% से 73% मामलों में बेहतर प्रदर्शन कर रही थीं। इन फंड मैनेजर्स को अलग-अलग सेक्टर्स में एलोकेशन बदलने की फ्लेक्सिबिलिटी का फायदा मिला। वहीं, लार्ज-कैप, वैल्यू और ELSS जैसी कैटेगरीज़ में, जहां निवेश के नियम ज़्यादा फिक्स्ड थे, उन्हें अपने बेंचमार्क को हराने में कम सफलता मिली।

SIPs की स्थिरता का कमाल

पिछले दो सालों के आंकड़े बताते हैं कि सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIPs) ने बाज़ार की अस्थिरता से काफी हद तक सुरक्षा प्रदान की। एक रेंज-बाउंड मार्केट में, जहां निफ्टी 50 24,400–24,500 के स्तर से नीचे बना रहा, वहीं लम्प-सम (एकमुश्त) निवेश अक्सर अचानक गिरावट का शिकार हुए। SIPs ने निवेशकों को समय के साथ अपने खरीद मूल्य को औसत करने का मौका दिया, जिससे रिटर्न अक्सर एकमुश्त निवेश से बेहतर रहे। यह फायदा स्मॉल-कैप कैटेगरी में ज़्यादा देखा गया, जहाँ Motilal Oswal Focused और Bank of India Small Cap जैसे फंड्स ने अपने लम्प-सम निवेश की तुलना में SIPs से कहीं ज़्यादा रिटर्न दिया।

इमर्जिंग मार्केट के रिस्क और आगे क्या?

अगस्त 2026 तक, ब्रॉडर मार्केट अभी भी कुछ खास मुश्किलों का सामना कर रहा है। एक्सचेंजों पर नए क्लोजिंग ऑक्शन मैकेनिज़्म के आने से अस्थायी अस्थिरता बढ़ी है, जिसने इंस्टीट्यूशनल ट्रेडिंग पैटर्न और इंडेक्स की स्थिरता को प्रभावित किया है। इसके अलावा, फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (FIIs) के लगातार आउटफ्लो ने लार्ज-कैप इंडेक्स पर दबाव बनाए रखा है। निवेशकों के लिए, पिछले दो सालों का प्रदर्शन एक रिमाइंडर है कि इंडेक्स का बढ़ना पोर्टफोलियो के बढ़ने की गारंटी नहीं है। कंसंट्रेशन रिस्क एक बड़ा फैक्टर है, खासकर उन फंड्स में जो सेक्टर रोटेशन के साथ तालमेल नहीं बिठा पाते। भविष्य में, शेयरधारकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि फंड मार्केट में गिरावट के दौरान 'डाउनसाइड कैप्चर' (पूंजी की सुरक्षा) बनाए रख सके और साथ ही मार्केट की तेज़ी में भी प्रभावी ढंग से हिस्सा ले सके।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.