भारतीय निवेशक अब 'Equal-Weight Funds' की ओर रुख कर रहे हैं ताकि कुछ चुनिंदा दिग्गज स्टॉक्स (Mega-caps) पर निर्भरता कम की जा सके। हालांकि यह रणनीति रिस्क को बांटती है, लेकिन इसमें अधिक वोलैटिलिटी (Volatility) और रीबैलेंसिंग का खर्च भी जुड़ा है।
पारंपरिक बेंचमार्क जैसे Nifty 50 कंपनी के मार्केट साइज के आधार पर काम करते हैं। 2026 के मध्य तक की स्थिति देखें, तो शीर्ष 10 दिग्गज कंपनियां पूरे इंडेक्स का 50% से अधिक हिस्सा कवर करती हैं। इसका मतलब है कि आपके निवेश का बड़ा हिस्सा केवल चंद कंपनियों के प्रदर्शन पर टिका है। यदि ये दिग्गज कंपनियां लड़खड़ाती हैं, तो पूरा इंडेक्स प्रभावित होता है, फिर बाकी बाजार का प्रदर्शन कैसा भी क्यों न हो।
इक्वल-वेटिंग की ओर झुकाव
इक्वल-वेट फंड्स इस नजरिए को पूरी तरह बदल देते हैं। यहाँ बड़ी कंपनियों का दबदबा नहीं होता, बल्कि इंडेक्स में शामिल हर कंपनी को लगभग 2% का समान वेटेज दिया जाता है। यह पोर्टफोलियो को अधिक लोकतांत्रिक (Democratic) बनाता है। समय-समय पर रीबैलेंसिंग (Rebalancing) के जरिए ये फंड्स महंगे स्टॉक्स को बेचकर उन कंपनियों में निवेश बढ़ाते हैं जो पिछड़ रही हैं, जिससे बाजार की व्यापक ग्रोथ का लाभ मिलता है।
रिस्क, वोलैटिलिटी और लागत (Costs)
रिस्क कम करने की इस प्रक्रिया में कुछ चुनौतियां भी हैं। चूंकि इन फंड्स में मिड-कैप और स्मॉल-कैप स्टॉक्स का एक्सपोजर ज्यादा होता है, इसलिए इनमें वोलैटिलिटी अधिक रहती है। बाजार में गिरावट के दौरान ये इंडेक्स स्टैंडर्ड इंडेक्स की तुलना में तेजी से गिर सकते हैं, क्योंकि इनके पास उन दिग्गज स्टॉक्स का 'कुशन' (Cushion) नहीं होता जो बाजार को संभाल कर रखते हैं।
इसके अलावा, रीबैलेंसिंग की प्रक्रिया में फंड हाउस को बार-बार शेयर खरीदने और बेचने पड़ते हैं, जिससे ट्रांजेक्शन कॉस्ट बढ़ती है। इसका असर एक्सपेंस रेशियो (Expense Ratio) और ट्रैकिंग एरर (Tracking Error) पर पड़ता है, जिसे निवेश करने से पहले समझना जरूरी है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
इक्वल-वेट फंड चुनना आपके मार्केट आउटलुक पर निर्भर करता है। अगर आप मानते हैं कि केवल चुनिंदा दिग्गज कंपनियां ही मार्केट को लीड करेंगी, तो पारंपरिक इंडेक्स बेहतर हैं। लेकिन, अगर आपको लगता है कि मिड और स्मॉल कैप स्टॉक्स में रोटेशन आएगा, तो यह रणनीति फायदेमंद हो सकती है। निवेश से पहले फंड के ऐतिहासिक प्रदर्शन और रीबैलेंसिंग के खर्चों का आकलन जरूर करें।
