Debt Mutual Funds: जून में ₹1.09 लाख करोड़ की भारी निकासी, क्या है वजह?

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
Debt Mutual Funds: जून में ₹1.09 लाख करोड़ की भारी निकासी, क्या है वजह?

जून महीने में डेट म्यूचुअल फंड्स से निवेशकों ने **₹1.09 लाख करोड़** निकाल लिए। यह पैसा मुख्य रूप से बड़े निवेशकों (Institutional Investors) ने तिमाही के आखिर में अपनी नकदी की जरूरतों को पूरा करने के लिए निकाला। लिक्विड और मनी मार्केट फंड्स में सबसे ज्यादा निकासी हुई, लेकिन कुल इंडस्ट्री की असेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) **₹82.22 लाख करोड़** तक पहुंच गई। वहीं, इक्विटी और हाइब्रिड स्कीम्स में इस दौरान अच्छी इनफ्लो (inflow) जारी रही।

डेट फंड्स से क्यों निकला पैसा?

एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया (AMFI) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, जून में डेट-ओरिएंटेड म्यूचुअल फंड्स से ₹1.09 लाख करोड़ की भारी निकासी देखी गई। यह मई के ₹96,949 करोड़ के मुकाबले ज्यादा है। इन निकासी के बावजूद, म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री ने मजबूती दिखाई और जून के अंत तक कुल असेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) बढ़कर ₹82.22 लाख करोड़ हो गई।

लिक्विड फंड्स पर सबसे ज्यादा दबाव

सबसे ज्यादा बिकवाली लिक्विड फंड्स में हुई, जिनका इस्तेमाल कॉर्पोरेट ट्रेजरी और बड़े निवेशक शॉर्ट-टर्म कैश रखने के लिए करते हैं। इन स्कीम्स से ₹42,293.3 करोड़ की नेट निकासी हुई, जबकि पिछले महीने यह आंकड़ा ₹29,681 करोड़ था। कॉर्पोरेट बॉन्ड फंड्स से भी ₹7,557.3 करोड़ की निकासी हुई, जो मई में ₹7,010 करोड़ थी। इसके अलावा, मनी मार्केट, ओवरनाइट, लो-ड्यूरेशन और अल्ट्रा-शॉर्ट-ड्यूरेशन जैसे शॉर्ट-टर्म कैटेगरी के फंड्स में भी काफी रिडेम्पशन (redemption) देखने को मिला।

सीजनल लिक्विडिटी मैनेजमेंट है वजह

एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह निकासी सीजनल लिक्विडिटी मैनेजमेंट का नतीजा है। कॉर्पोरेट और इंस्टीट्यूशनल निवेशकों की ट्रेजरी अक्सर हर तिमाही के आखिर में टैक्स पेमेंट और वर्किंग कैपिटल की जरूरतों को पूरा करने के लिए इन शॉर्ट-टर्म डेट फंड्स से पैसा निकालते हैं। इसे डेट मार्केट में लॉन्ग-टर्म भरोसे की कमी के बजाय रूटीन ट्रेजरी ऑपरेशन का हिस्सा माना जा रहा है।

इक्विटी और हाइब्रिड फंड्स की चमक बरकरार

जहां एक तरफ डेट फंड्स दबाव में दिखे, वहीं म्यूचुअल फंड इंडस्ट्री के दूसरे सेगमेंट में अच्छी ग्रोथ जारी रही। इक्विटी-ओरिएंटेड स्कीम्स में जून में ₹28,973 करोड़ का नेट इनफ्लो आया, जबकि हाइब्रिड फंड्स ने ₹12,893 करोड़ आकर्षित किए। इन इनफ्लो ने कुल AUM को गिरने से रोका।

आगे क्या?

घरेलू बॉन्ड मार्केट का आउटलुक मैक्रोइकॉनॉमिक फैक्टर्स पर निर्भर करेगा, जिसमें क्रूड ऑयल की कीमतों में नरमी और महंगाई के मॉडरेट ट्रेंड शामिल हैं। हाल के दिनों में सरकारी बॉन्ड यील्ड्स में गिरावट देखी गई है, जो फिक्स्ड-इनकम स्पेस में बेहतर सेंटीमेंट का संकेत देती है। निवेशक आगे महंगाई के आंकड़े, मॉनसून की प्रगति और सरकारी उधारी कार्यक्रम पर नजर रखेंगे। वहीं, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की ब्याज दरों पर नीतियां भी फिक्स्ड-इनकम सेक्टर के लिए महत्वपूर्ण रहेंगी।

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