लिक्विडिटी की भारी कमी का सामना कर रहे डेट फंड्स
March 2026 में डेट म्यूचुअल फंड्स से ₹2.94 लाख करोड़ की भारी निकासी देखी गई, जो फरवरी के ₹42,106 करोड़ के नेट इनफ्लो से एकदम अलग तस्वीर पेश करती है। यह आउटफ्लो खासकर शॉर्ट-टर्म और लिक्विडिटी-केंद्रित फंड कैटेगरीज़ में ज्यादा देखा गया। अकेले लिक्विड फंड्स (Liquid Funds) से ₹1.34 लाख करोड़ निकाले गए। ओवरनाइट फंड्स (Overnight Funds), मनी मार्केट फंड्स (Money Market Funds) और लो ड्यूरेशन फंड्स (Low Duration Funds) से भी क्रमश: ₹40,228 करोड़, ₹29,207 करोड़ और ₹25,227 करोड़ निकाले गए। कॉर्पोरेट बॉन्ड फंड्स (Corporate Bond Funds) में भी निकासी बढ़कर ₹15,293 करोड़ हो गई, जो पिछले महीने केवल ₹2,302 करोड़ थी। इससे पता चलता है कि यह निकासी किसी खास क्रेडिट इश्यू के बजाय नकदी की जरूरत के चलते हुई है। गिल्ट फंड्स (Gilt Funds) से भी लगातार निकासी जारी रही, जो लंबी अवधि के बॉन्ड्स में निवेशकों की घटती रुचि को दर्शाता है।
शेयर बाजार (Equity) में इनफ्लो, डेट से आउटफ्लो
जहां डेट फंड्स से भारी निकासी हुई, वहीं दूसरी ओर इक्विटी म्यूचुअल फंड्स (Equity Mutual Funds) में लगातार मजबूत इनफ्लो जारी रहा। मार्च में इक्विटी स्कीम्स ने ₹40,450 करोड़ का नेट इनफ्लो आकर्षित किया, जो फरवरी की तुलना में 56% ज्यादा है। डोमेस्टिक इन्वेस्टर्स ने फ्लेक्सी कैप, मिड कैप और स्मॉल कैप फंड्स जैसी कैटेगरीज़ में भरोसा दिखाया। यह स्थिति बताती है कि जहां फिक्स्ड इनकम सेगमेंट में लिक्विडिटी की कमी दिखी, वहीं इक्विटी में पूंजी का प्रवाह बना रहा।
भू-राजनीतिक तनाव और बढ़ती महंगाई का असर
बाजार के दबावों के बीच, मध्य पूर्व (Middle East) में भू-राजनीतिक तनावों के कारण कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया है। तेल की कीमतें $120 प्रति बैरल के पार चली गई हैं, जिससे शिपिंग रूट्स जैसे स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) प्रभावित हुए हैं। इससे महंगाई (Inflation) की चिंता बढ़ गई है और बॉन्ड यील्ड्स (Bond Yields) में तेजी आई है। 10-वर्षीय बेंचमार्क सरकारी बॉन्ड यील्ड मार्च में 37 बेसिस पॉइंट्स बढ़कर 7.0345% हो गई, जो जून 2024 की शुरुआत के बाद सबसे ज्यादा है। इस बढ़ोतरी ने कॉरपोरेट बॉन्ड इश्यूएंस (Corporate Bond Issuance) पर दबाव डाला, जो मार्च में साल-दर-साल 24% घटकर ₹989.96 बिलियन रह गया। कई सरकारी कंपनियों ने अपने इश्यूज़ को टाल दिया या रद्द कर दिया, क्योंकि निवेशक ज्यादा ब्याज दरें मांग रहे थे। फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) ने भी रिस्क-ऑफ (Risk-off) सेंटीमेंट दिखाया, रिकॉर्ड इक्विटी बिकवाली की और मार्च में डेट सेगमेंट से पैसा निकाला।
एनालिस्ट्स का कहना - साल के अंत की कैश मैनेजमेंट, पर लिक्विडिटी टाइट
एनालिस्ट्स ने डेट फंड्स से आउटफ्लो का मुख्य कारण फाइनेंशियल ईयर के अंत में इंस्टीट्यूशंस और कॉर्पोरेट ट्रेज़रीज़ द्वारा कैश मैनेजमेंट को बताया है। मॉर्निंगस्टार इन्वेस्टमेंट रिसर्च इंडिया की नेहाला मेश्राम के अनुसार, यह आउटफ्लो शॉर्ट-टर्म और ट्रेज़री-केंद्रित फंड्स में ज्यादा था, जो मौसमी कैश मैनेजमेंट को दर्शाता है। हालांकि, कुछ एनालिस्ट्स ने लिक्विडिटी की जटिल स्थिति का भी जिक्र किया। आरबीआई (RBI) ने बाजार को सहारा देने के लिए लिक्विडिटी इंजेक्ट की, न कि सीधे दरें घटाकर। इसके बावजूद, बड़े सरकारी उधार की जरूरतें, जिसमें यूनियन बजट 2026-27 में ₹17 ट्रिलियन से अधिक के रिकॉर्ड उधार लक्ष्य शामिल हैं, ने यील्ड्स को और बढ़ाया।
उधार लागत में बढ़ोतरी की चिंता
मौसमी कैश मैनेजमेंट के अलावा, भू-राजनीतिक जोखिमों, ऊंचे तेल की कीमतों और लगातार सरकारी उधार ने एक चुनौतीपूर्ण माहौल बनाया है। कॉर्पोरेट बॉन्ड इश्यूएंस में साल-दर-साल आई भारी गिरावट बताती है कि बढ़ती यील्ड्स उधारकर्ताओं को हतोत्साहित कर रही हैं और उधार लागत बढ़ा रही हैं। कॉर्पोरेट और सरकारी बॉन्ड्स के बीच 80 बेसिस पॉइंट्स से ज्यादा का बढ़ा हुआ स्प्रेड (Spread) भी बढ़े हुए जोखिम को दर्शाता है। इससे कम क्रेडिट रेटिंग वाली कंपनियों को बैंक लोन पर ज्यादा निर्भर रहना पड़ रहा है, जो खुद टाइट हो रहे हैं। NABARD और REC जैसी बड़ी संस्थाओं द्वारा इश्यूज़ का टलना या रद्द होना निवेशकों की सावधानी और जारीकर्ताओं के लिए स्वीकार्य दरों पर फंड जुटाने में कठिनाई को उजागर करता है। यह स्थिति अस्थायी नकदी प्रबंधन को कंपनियों के लिए लंबी अवधि की उच्च उधार लागत में बदल सकती है।
बॉन्ड यील्ड्स का आगे का सफर
आगे चलकर, बॉन्ड यील्ड्स के रेंज-बाउंड (Range-bound) रहने की उम्मीद है, लेकिन कच्चे तेल की कीमतों और भू-राजनीतिक घटनाक्रमों के कारण इनमें अस्थिरता बनी रह सकती है। एनालिस्ट्स का अनुमान है कि 10-वर्षीय यील्ड 6.60%-6.85% या 6.75%-7.10% के बीच कारोबार करेगी। आरबीआई (RBI) अपनी लिक्विडिटी मैनेजमेंट पर ध्यान केंद्रित करते हुए एक तटस्थ मौद्रिक नीति (Monetary Policy) रुख बनाए रखने की उम्मीद है। डोमेस्टिक डिमांड बॉन्ड मार्केट्स का समर्थन कर रही है, लेकिन बाहरी कारक और सरकारी उधार यील्ड कर्व को आकार देना जारी रखेंगे। निवेशकों को सावधानी भरा रवैया अपनाने और अस्थिरता से निपटने के लिए मॉडरेट बॉन्ड ड्यूरेशन पर फोकस करने की सलाह दी जाती है।