इनफ्लो का सोर्स
इस बंपर इनफ्लो का सबसे बड़ा सहारा लिक्विडिटी-केंद्रित सेगमेंट्स रहे। ओवरनाइट फंड्स ने अकेले ₹46,280 करोड़ जुटाए, वहीं लिक्विड फंड्स में ₹30,682 करोड़ आए। मनी मार्केट फंड्स (Money Market Funds) ने भी ₹12,763 करोड़ का इजाफा देखा। यह सब कॉर्पोरेट और संस्थागत ग्राहकों द्वारा साल के अंत की गतिविधियों के बाद अपने पैसे को वापस निवेश करने का नतीजा है, न कि किसी बड़ी स्ट्रैटेजिक शिफ्ट का।
परदे के पीछे की कहानी
लेकिन, जब हम थोड़े गहराई में जाते हैं, तो तस्वीर थोड़ी अलग दिखती है। जहां लिक्विडिटी वाले फंड्स चमके, वहीं डेट फंड्स के दूसरे सेगमेंट्स, जैसे कॉर्पोरेट बॉन्ड फंड्स (Corporate Bond Funds) से ₹11,473 करोड़, डायनामिक बॉन्ड फंड्स (Dynamic Bond Funds) से ₹1,435 करोड़ और लॉन्ग-ड्यूरेशन फंड्स (Long-Duration Funds) से ₹1,336 करोड़ का आउटफ्लो भी देखा गया। यह साफ दिखाता है कि निवेशक अभी भी लंबी अवधि के असेट्स या ज्यादा रिस्क लेने से कतरा रहे हैं, और पूंजी संरक्षण (Capital Preservation) को प्राथमिकता दे रहे हैं।
शेयर बाजार और सोने का हाल
इस दौरान, शेयर बाजार (Equity Market) में काफी 'रिस्क-ऑफ' (Risk-off) सेंटिमेंट हावी रहा। निफ्टी 50 (Nifty 50) 3.0% गिरा, और मिड व स्मॉल कैप्स में और भी बड़ी गिरावट आई। इसके विपरीत, गोल्ड ईटीएफ (Gold ETF) निवेशकों के लिए 'सेफ हेवन' (Safe Haven) साबित हुए। जनवरी 2026 में गोल्ड ईटीएफ में इनफ्लो 50% बढ़कर करीब ₹24,040 करोड़ तक पहुंच गया, जो इक्विटी फंड्स के कुल इनफ्लो से भी ज्यादा था।
मैक्रो इकोनॉमिक संकेत
फरवरी 2026 की शुरुआत में, भारत के 10-साल के सरकारी बॉन्ड यील्ड (10-year Government Bond Yield) 6.7% से 6.76% के आसपास बने रहे, जिनमें सप्लाई और फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) की चिंताओं के कारण ऊपर की ओर दबाव देखा गया। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने फरवरी 2026 में अपनी मॉनेटरी पॉलिसी में रेपो रेट (5.25%) को स्थिर रखा और न्यूट्रल (Neutral) स्टैंड बनाए रखा। हालांकि, FY26 के लिए जीडीपी ग्रोथ (GDP Growth) का अनुमान बढ़ाया गया है, लेकिन महंगाई के आंकड़े लक्ष्य के दायरे में लौट रहे हैं, बावजूद इसके कि नई मापन विधियों से अंतर्निहित दबाव छिप सकते हैं।
विदेशी निवेशकों की चिंता और भविष्य
जनवरी 2026 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने भारतीय इक्विटी से करीब $3.95 बिलियन की बिकवाली की, जो 2025 में जारी रही भारी बिकवाली के सिलसिले को आगे बढ़ाता है। भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Tensions), व्यापारिक समझौते और करेंसी डेप्रिसिएशन (Currency Depreciation) की चिंताएं विदेशी निवेशकों को भारतीय बाजारों से सतर्क कर रही हैं। ऐसे में, डेट फंड्स में मौजूदा इनफ्लो एक टैक्टिकल (Tactical) कदम नजर आ रहा है, न कि कोई स्ट्रैटेजिक (Strategic) बदलाव। जब तक पॉलिसी से जुड़े संकेत और स्पष्ट नहीं होते और बाहरी जोखिम कम नहीं होते, तब तक लंबी अवधि के डेट इंस्ट्रूमेंट्स में बड़ा निवेश मुश्किल लग रहा है। यह पैटर्न जनवरी 2025 के ₹1.28 लाख करोड़ के इनफ्लो जैसा ही है, जो दिसंबर 2024 के आउटफ्लो के बाद आया था।