अक्सर निवेशक उन शेयरों या सेक्टरों के पीछे भागते हैं जो पहले से ही शिखर पर पहुंच चुके हैं। डेटा बताता है कि ट्रेंड का पीछा करने से वेल्थ क्रिएशन की जगह नुकसान की संभावना बढ़ जाती है। लंबी अवधि के लिए अनुशासित निवेश ही पोर्टफोलियो को मार्केट की गिरावट से बचा सकता है।
हाल के मार्केट ट्रेंड्स को देखें, तो कई निवेशक मनोवैज्ञानिक जाल में फंस जाते हैं, जिसे फाइनेंस की भाषा में 'रिसेंसी बायस' (Recency Bias) कहा जाता है। निवेशक उन शेयरों या सेक्टरों को चुनते हैं जो हाल ही में सुर्खियों में रहे हैं, यह सोचकर कि तेजी आगे भी जारी रहेगी। लेकिन भारतीय बाजार का इतिहास गवाह है कि यह रणनीति अक्सर तब महंगी पड़ती है जब बाजार में करेक्शन का दौर शुरू होता है।
ट्रेंड चेजिंग का जोखिम
जनवरी से अक्टूबर 2026 के बीच Nifty में 15.6% की गिरावट आई, जिसने उन निवेशकों को सबसे ज्यादा चोट पहुंचाई जो ऊंचे वैल्यूएशन वाले शेयरों में फंस गए थे। एक चौंकाने वाला डेटा सामने आया है कि FY22 से FY24 के दौरान करीब 93% व्यक्तिगत ट्रेडर्स को F&O ट्रेडिंग में नुकसान उठाना पड़ा। यह स्पष्ट करता है कि शॉर्ट-टर्म मुनाफे के चक्कर में रिस्क लेना अक्सर गलत साबित होता है।
म्यूचुअल फंड की दुनिया में भी यही स्थिति है। टॉप परफॉर्मिंग फंड्स भी हमेशा अपनी रैंकिंग बरकरार नहीं रख पाते। जैसे ही निवेशक किसी फंड में पैसा लगाते हैं, मार्केट लीडरशिप बदलने से उसका प्रदर्शन नीचे आ जाता है।
पोर्टफोलियो के लिए सुरक्षा चक्र
अनुशासित निवेश के लिए 'एसेट एलोकेशन' सबसे बड़ा हथियार है। अपने पोर्टफोलियो को इक्विटी, डेट और गोल्ड जैसे एसेट क्लासेस में सही अनुपात में बांटकर आप किसी एक सेक्टर के बबल से खुद को सुरक्षित रख सकते हैं।
इसके साथ ही, 'रीबैलेंसिंग' (Rebalancing) जरूरी है। समय-समय पर उन एसेट्स का मुनाफा बुक करना जो अच्छा परफॉर्म कर चुके हैं, और उस पैसे को उन जगहों पर लगाना जो अभी अंडरवैल्यूड हैं, आपको 'हाई सेल और लो बाय' की रणनीति पर टिके रहने में मदद करता है।
लंबी अवधि का विजन
वेल्थ क्रिएशन किसी एक बड़े ट्रेंड को पकड़ने से नहीं, बल्कि लगातार निवेश (SIP) जारी रखने से होता है। मार्केट की उठापटक के बीच अपने लॉन्ग-टर्म प्लान पर टिके रहना ही एक सफल निवेशक की सबसे बड़ी चुनौती और खूबी है।
