जून तिमाही में Category III Alternative Investment Funds (AIFs) के प्रति निवेशकों का रुझान तेजी से बढ़ा है। इन फंड्स में कमिटमेंट **35.3%** बढ़कर **₹3.37 लाख करोड़** के स्तर पर पहुंच गई है।
जुलाई-सितंबर तिमाही के डेटा से पता चलता है कि वेल्थ मैनेजमेंट और फैमिली ऑफिस की दुनिया में अब बड़े बदलाव आ रहे हैं। पारंपरिक निवेश के बजाय अब लोग अधिक लचीले और 'एक्टिव मैनेजमेंट' वाले विकल्पों को प्राथमिकता दे रहे हैं।\n\n### कैटेगरी III फंड्स ही क्यों?
\nये फंड्स काफी हद तक 'हेज फंड' की तरह काम करते हैं। ये पब्लिक मार्केट में एक्टिव ट्रेडिंग की सुविधा देते हैं। 'लॉन्ग-शॉर्ट' जैसी स्ट्रेटेजी के जरिए फंड मैनेजर बाजार के उतार-चढ़ाव का फायदा उठाने की कोशिश करते हैं। चूंकि रियल एस्टेट और प्राइवेट डेट जैसे एसेट्स में फिलहाल लिक्विडिटी की समस्या है, इसलिए निवेशक उन फंड्स की ओर भाग रहे हैं जहां से पैसा जल्दी निकाला जा सके।\n\n### बाकी कैटेगरी का हाल
\nअगर पूरे इंडस्ट्री की बात करें, तो Category II AIF अभी भी बाजार के दिग्गज बने हुए हैं, जिनमें ₹13.03 लाख करोड़ का कमिटमेंट है। हालांकि, रियल एस्टेट सेक्टर में सुस्ती के कारण इनकी ग्रोथ थोड़ी धीमी रही है। वहीं, Category I AIF (खासकर डिस्ट्रेस्ड एसेट्स पर ध्यान केंद्रित करने वाले) में 50% के करीब इजाफा देखा गया है।\n\n### निवेश से पहले सावधान रहें (Risk Factor)\n\nइन फंड्स में फ्लेक्सिबिलिटी तो है, लेकिन जोखिम भी उतने ही ज्यादा हैं। चूंकि ये डेरिवेटिव्स और लेवरेज (उधार) का सहारा लेते हैं, इसलिए मार्केट में तेज गिरावट आने पर नुकसान की संभावना बनी रहती है। साथ ही, इनमें न्यूनतम निवेश की सीमा काफी अधिक होती है, जो इसे केवल बड़े और समझदार निवेशकों के लिए ही उपयुक्त बनाती है।\n\nSEBI भी अब इन फंड्स को लेकर काफी सख्त हो गया है। वैल्यूएशन और पारदर्शिता (Transparency) को लेकर नए नियम लाए जा रहे हैं, ताकि रिटेल और बड़े निवेशकों का पैसा सुरक्षित रहे। एक चिंताजनक पहलू यह भी है कि स्टार्टअप्स या शुरुआती दौर के व्यवसायों में अभी भी कुल AIF कैपिटल का सिर्फ 3% ही जा रहा है।
