बिजनेस साइकिल फंड्स आजकल निवेशकों के बीच काफी पॉपुलर हो रहे हैं। ये फंड्स इकोनॉमी के बदलते ट्रेंड्स के हिसाब से अपना पोर्टफोलियो एडजस्ट करते हैं। लेकिन एक्सपर्ट्स की सलाह है कि इन्हें अपनी कुल इन्वेस्टमेंट का सिर्फ एक छोटा हिस्सा ही रखें।
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क्यों रखें सिर्फ 15% तक?
फाइनेंशियल प्लानर्स, जैसे PCC Investing के कुशल भार्गी और Complete Circle Consultants के क्षितिज महाजन, सलाह देते हैं कि इन फंड्स को अपनी इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजी का मेन हिस्सा न बनाएं। इन्हें 'सैटेलाइट होल्डिंग' की तरह इस्तेमाल करना चाहिए। इसका मतलब है कि आपके कुल पोर्टफोलियो का एक छोटा हिस्सा ही इन फंड्स में निवेश किया जाए, जिसका मकसद एक्स्ट्रा ग्रोथ हासिल करना हो, न कि स्टेबिलिटी। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इन फंड्स में कुल म्यूचुअल फंड होल्डिंग का 10-15% से ज़्यादा निवेश नहीं करना चाहिए।
आपके पोर्टफोलियो का कोर हिस्सा लार्ज-कैप या फ्लेक्सी-कैप जैसे ज़्यादा स्टेबल और लॉन्ग-टर्म ऑप्शंस में होना चाहिए। ये फंड्स अलग-अलग मार्केट कंडीशंस में अच्छा परफॉरमेंस देने के लिए बने होते हैं। वहीं, बिजनेस साइकिल फंड्स में ज़्यादा वोलेटिलिटी (volatility) होती है, क्योंकि इनका परफॉरमेंस फंड मैनेजर की इकोनॉमिक शिफ्ट्स को सही समय पर पहचानने और भुनाने की क्षमता पर निर्भर करता है।
क्यों ज़रूरी है लंबा होराइज़न?
ये फंड्स इकोनॉमिक ट्रेंड्स पर चलते हैं, इसलिए इनका परफॉरमेंस शॉर्ट-टर्म मार्केट बदलावों से बहुत ज़्यादा प्रभावित हो सकता है। इस रिस्क को मैनेज करने के लिए, एक्सपर्ट्स लम्बी अवधि के इन्वेस्टमेंट पर ज़ोर देते हैं। कम से कम 5 से 7 साल का इन्वेस्टमेंट होराइज़न रखने से फंड की स्ट्रैटेजी अलग-अलग इकोनॉमिक साइकल्स में काम कर पाती है। इससे परफॉरमेंस में आने वाले डिप्स (dips) को स्मूथ करने में मदद मिलती है, खासकर तब जब किसी सेक्टर में किया गया दांव तुरंत सफल न हो।
जो निवेशक इन फंड्स में पैसा लगाना चाहते हैं, उन्हें स्कीम के अंडरलाइंग सेक्टर एक्सपोजर पर भी नज़र रखनी चाहिए। क्योंकि फंड मैनेजर एक सेक्टर से दूसरे सेक्टर में पैसा शिफ्ट करते हैं, फंड का रिस्क प्रोफाइल समय के साथ काफी बदल सकता है। यह ज़रूरी है कि निवेशक यह देखें कि फंड के मौजूदा सेक्टर बेट्स उनकी पर्सनल रिस्क टॉलरेंस के हिसाब से सही हैं या नहीं। अगर कोई निवेशक फंड मैनेजर द्वारा मार्केट टाइमिंग के रिस्क के साथ कम्फर्टेबल नहीं है, तो वे ब्रॉड-मार्केट इंडेक्स फंड्स या डाइवर्सिफाइड इक्विटी स्कीम्स में ज़्यादा स्टेबिलिटी पा सकते हैं, जो इकोनॉमिक फेज की परवाह किए बिना कंसिस्टेंट सेक्टर वेटेज बनाए रखती हैं।
