Arbitrage Funds आज के समय में Debt इंस्ट्रूमेंट्स का एक सुरक्षित और टैक्स-एफिशिएंट विकल्प बनकर उभरे हैं। हालांकि, यूनियन बजट 2026 में बढ़े STT ने फंड की लागत पर दबाव बढ़ा दिया है, जिससे निवेशकों को सतर्क रहने की जरूरत है।
Arbitrage funds भारतीय निवेशकों के लिए सरप्लस कैश को पार्क करने का एक बेहतरीन जरिया बन चुके हैं। यह फंड कैश और डेरिवेटिव मार्केट के बीच कीमतों के अंतर (Price Difference) का फायदा उठाकर रिटर्न जेनरेट करते हैं। पारंपरिक डेट फंड्स के मुकाबले इनका सबसे बड़ा फायदा इनका टैक्स स्ट्रक्चर है, खासकर उन निवेशकों के लिए जो 30% के टैक्स स्लैब में आते हैं।
टैक्स का गणित (Tax Efficiency)
इन फंड्स को 'इक्विटी-ओरिएंटेड' कैटेगरी में रखा जाता है, जिसके लिए उन्हें कम से कम 65% पैसा इक्विटी में लगाना होता है। मौजूदा नियमों के अनुसार, लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) पर 12.5% टैक्स लगता है (जिसमें ₹1.25 लाख तक की छूट है), जबकि शॉर्ट टर्म गेन्स पर 20% टैक्स देना होता है। यह उन लोगों के लिए बहुत किफायती है जिन्हें शुद्ध डेट फंड्स पर अपने स्लैब के हिसाब से टैक्स देना पड़ता है।
बजट 2026 और बढ़ती चुनौतियां
बजट 2026 में सरकार ने फ्यूचर्स सेलिंग पर STT बढ़ाकर 0.05% और ऑप्शन प्रीमियम/एक्सरसाइज पर 0.15% कर दिया है। चूंकि आर्बिट्राज स्ट्रैटेजी में बार-बार ट्रेडिंग करनी पड़ती है, इसलिए ये बढ़ी हुई लागत सीधे तौर पर फंड के नेट रिटर्न को कम कर रही है। जब मार्केट में स्प्रेड कम होता है, तो ये ट्रांजेक्शन कॉस्ट प्रॉफिट मार्जिन को दबा देती है, जिससे महंगाई (CPI) को मात देना मुश्किल हो जाता है।
क्या है रिस्क और सीमाएं?
आर्बिट्राज फंड पूरी तरह रिस्क-फ्री नहीं हैं। इनका प्रदर्शन पूरी तरह से मार्केट की लिक्विडिटी और वोलेटिलिटी पर निर्भर करता है। अगर मार्केट स्प्रेड कम होता है या डेरिवेटिव बाजार में लिक्विडिटी घटती है, तो रिटर्न गिर सकते हैं। विशेषज्ञों की मानें तो इन्हें 3 महीने से 1 साल के नजरिए से ही देखना चाहिए। यह वेल्थ क्रिएशन का जरिया नहीं, बल्कि कैपिटल प्रिजर्वेशन का एक टूल है। निवेशकों को सलाह है कि वे निवेश से पहले मार्केट स्प्रेड और फंड मैनेजर की ट्रेडिंग एफिशिएंसी को जरूर ट्रैक करें।
