म्युचुअल फंड निवेश में एक्टिव बनाम पैसिव की बहस पुरानी है। मॉर्निंगस्टार के ताजा डेटा के मुताबिक, भले ही पहले कुछ सालों में एक्टिव फंड्स बेहतर रिटर्न देते हैं, लेकिन **10 साल** की अवधि में इनकी परफॉरमेंस काफी कम हो जाती है।
एक्टिव और पैसिव निवेश के बीच की जंग मुख्य रूप से 'अल्फा' (Alpha) जनरेट करने पर टिकी है। मॉर्निंगस्टार एक्टिव/पैसिव बैरोमीटर के 30 जून, 2026 तक के आंकड़ों से साफ पता चलता है कि फंड मैनेजरों की शॉर्ट टर्म में मार्केट को मात देने की क्षमता लॉन्ग टर्म में कमजोर पड़ जाती है।
शॉर्ट टर्म में एक्टिव फंड्स का दबदबा
डेटा के मुताबिक, करीब 87.9% लार्ज-कैप एक्टिव फंड्स ने 1 साल की अवधि में पैसिव बेंचमार्क को पीछे छोड़ दिया है। इसकी मुख्य वजह फंड मैनेजरों द्वारा सही स्टॉक्स का चुनाव और बाजार की अस्थिरता के दौरान रिस्क मैनेजमेंट है, जो इंडेक्स फंड्स में नहीं मिल पाता।
लंबी अवधि में क्यों बढ़ती है मुश्किल?
लंबे समय में एक्टिव फंड्स की सफलता दर गिरकर केवल 25.8% रह जाती है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है 'कॉस्ट हर्डल'। एक्टिव फंड्स का एक्सपेंस रेशियो (TER) इंडेक्स फंड्स और ETFs की तुलना में काफी ज्यादा होता है। समय के साथ यह अधिक फीस आपके नेट रिटर्न पर भारी पड़ने लगती है।
इसके अलावा, बाजार की तेजी अक्सर कुछ चुनिंदा 'इंडेक्स हैवीवेट्स' के दम पर आती है। यदि कोई एक्टिव मैनेजर इन शेयरों को सही वेटेज नहीं दे पाता है, तो वह इंडेक्स के मुकाबले पिछड़ जाता है। वहीं, पैसिव फंड्स इंडेक्स को हूबहू कॉपी करते हैं, जिससे वे इस रैली का पूरा फायदा उठा लेते हैं।
निवेशकों के लिए सलाह
अगर आप बाजार को मात देने (Alpha) की क्षमता रखते हैं और अच्छे ट्रैक रिकॉर्ड वाले मैनेजर चुन सकते हैं, तो एक्टिव फंड्स अब भी एक विकल्प हैं। हालांकि, जो निवेशक कम लागत और predictability (पूर्वानुमान) चाहते हैं, उनके लिए इंडेक्स फंड्स ज्यादा कारगर साबित हो सकते हैं। निवेश करते समय फंड के एक्सपेंस रेशियो और मैनेजर की निरंतरता पर नजर रखना बेहद जरूरी है, क्योंकि कंपाउंडिंग का असर लंबे समय में फीस के जरिए आपके मुनाफे को प्रभावित करता है।
