क्वालिटी पर बड़ा मतभेद
भारत के कॉपर इंडस्ट्री में एक बड़ा मतभेद सामने आया है। सरकार स्क्रैप (कबाड़) से बने कॉपर वायर रॉड के लिए नेशनल क्वालिटी स्टैंडर्ड बनाने की सोच रही है, लेकिन Adani Enterprises, Vedanta, और Hindalco Industries जैसी बड़ी प्राइमरी प्रोड्यूसर कंपनियाँ इसके सख्त खिलाफ हैं। उनका तर्क है कि रीसाइकिल किए गए कॉपर का इस्तेमाल करने वाले सेकेंडरी रिफाइनर्स के प्रोडक्ट सुरक्षा और क्वालिटी के मामले में चिंता का विषय बन सकते हैं।
इन कंपनियों की मुख्य चिंता यह है कि स्क्रैप से बने रॉड में इम्पेरिटी (अशुद्धि) की वजह से ओवरहीटिंग और आग लगने जैसी गंभीर समस्याएँ हो सकती हैं, खासकर इलेक्ट्रिकल इस्तेमाल में। इस पूरे रेगुलेटरी मामले में Bureau of Indian Standards (BIS) अहम भूमिका निभा रहा है।
प्राइमरी प्रोड्यूसर्स की सुरक्षा की चिंता
Indian Primary Copper Association (IPCPA) जैसे इंडस्ट्री ग्रुप, जिनमें Adani, Vedanta, Hindalco, और Hindustan Copper शामिल हैं, ने इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया है। मीटिंग मिनट्स से पता चलता है कि IPCPA का मानना है कि कई सेकेंडरी रिफाइनर्स के पास एडवांस्ड टेक्नोलॉजी की कमी है, जिससे वे लगातार फायर-रिफाइंड हाई कंडक्टिविटी (FRHC) कॉपर रॉड बना सकें जो सख्त ज़रूरतों को पूरा करें। एसोसिएशन का कहना है कि कुछ निर्माता सिर्फ स्क्रैप को पिघलाकर ऐसे मटेरियल बना रहे हैं जो क्वालिटी के जरूरी मानकों से नीचे हैं। वे चेतावनी देते हैं कि इस प्रैक्टिस से ट्रांसफार्मर और पावर केबल जैसे इक्विपमेंट में इलेक्ट्रिकल आग लगने का खतरा काफी बढ़ जाता है।
सेकेंडरी रिफाइनर्स का क्वालिटी बचाव
वहीं, सेकेंडरी कॉपर प्रोड्यूसर्स का कहना है कि उनके स्थापित फायर रिफाइनिंग तरीके कॉपर के केमिकल कंपोजीशन को प्रभावी ढंग से कंट्रोल करते हैं और केबल बनाने के लिए जरूरी इंटरनेशनल कंडक्टिविटी स्टैंडर्ड्स को पूरा करते हैं। उनका दावा है कि उनकी प्रोसेस से हाई-क्वालिटी प्रोडक्ट बनते हैं।
हालांकि, IPCPA के प्रेसिडेंट और Hindalco के कॉपर डिविजन के हेड, रोहित पाठक, का मानना है कि स्क्रैप को फायर-रिफाइन करने से इलेक्ट्रिकल एप्लीकेशन के लिए जरूरी 99.99% प्यूरिटी (शुद्धता) लगातार हासिल नहीं की जा सकती। उन्होंने यूजर सेफ्टी सुनिश्चित करने के साथ-साथ रीसाइक्लिंग को भी सपोर्ट करने के लिए स्क्रैप से बने FRHC कॉपर के लिए अलग क्वालिटी स्टैंडर्ड बनाने का सुझाव दिया है।
मार्केट में गतिरोध और बड़े असर
इस इंडस्ट्री डिस्प्यूट के चलते एक लंबा गतिरोध पैदा हो गया है, जिससे कॉपर रॉड मार्केट का एक बड़ा हिस्सा प्रभावित हो रहा है। फाइनेंशियल ईयर मार्च 2025 में खत्म होने वाले पीरियड के लिए भारत की कुल कॉपर रॉड डिमांड लगभग 1.2 मिलियन मीट्रिक टन होने का अनुमान है, जिसमें से लगभग 400,000 टन अभी बिना ऑफिशियल क्वालिटी कंट्रोल के ट्रेड हो रहा है।
यह डिस्टर्बेंस ऐसे समय में हो रहा है जब ग्लोबल सप्लाई चेन में अस्थिरता है, जिसमें UAE से इम्पोर्ट की समस्याएँ शामिल हैं, और मिडिल ईस्ट के जियोपॉलिटिकल टेंशन ने इसे और बढ़ा दिया है। मार्केट के एक बड़े हिस्से के लिए स्टैंडर्ड क्वालिटी का अभाव एंड-यूज़र्स के लिए रिस्क पैदा करता है और भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लॉन्ग-टर्म इम्पैक्ट और इंटरनेशनल सेफ्टी स्टैंडर्ड्स के पालन पर सवाल खड़े करता है।
ग्लोबल सिनेरियो और सेक्टर ट्रेंड्स
ग्लोबली, कॉपर की कीमतें इकोनॉमिक फैक्टर्स और सप्लाई-डिमांड के उतार-चढ़ाव के कारण बदलती रही हैं। जहां प्राइमरी प्रोड्यूसर्स टॉप-टियर इस्तेमाल के लिए प्यूरिटी पर ध्यान केंद्रित करते हैं, वहीं ग्लोबल फोकस सर्कुलर इकोनॉमी प्रिंसिपल्स पर रीसाइकल्ड मटेरियल को सपोर्ट कर रहा है। दूसरे देशों के कॉम्पिटिटर्स शायद नए और रीसाइकल्ड कॉपर के लिए पहले से ही डुअल स्टैंडर्ड रखते हों। भारत की यह बहस एनवायरनमेंटल गोल्स और क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए कड़े सेफ्टी ज़रूरतों के बीच एक ग्लोबल टेंशन को दर्शाती है।
हालिया एनालिस्ट आउटलुक बेस मेटल्स के लिए धीमे ग्लोबल इंडस्ट्रियल आउटपुट के कारण सतर्क हैं, जिससे संभवतः प्रोड्यूसर्स को प्राइमरी प्रोडक्शन या स्क्रैप के इस्तेमाल से एफिशिएंसी सुधारने का दबाव पड़ सकता है। हालांकि, तत्काल ज़रूरत रेगुलेटरी क्लैरिटी की है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि नए स्टैंडर्ड भारत के पावर इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान न पहुँचाएँ।
