भारत में टीवी ब्रॉडकास्टिंग सेक्टर त्योहारी सीजन को लेकर बड़ी मुश्किल में पड़ गया है। ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) की रेटिंग्स के लंबे समय से सस्पेंड रहने के कारण, खासकर अगस्त से दिसंबर के बीच होने वाले बड़े रियलिटी शोज के लिए विज्ञापन डील करने में दिक्कतें आ रही हैं।
Detailed Coverage
क्यों आई एड डील में रुकावट?
BARC की रेटिंग्स के न होने से मीडिया कंपनियों के सबसे अहम समय, यानी त्योहारी सीजन (अगस्त-दिसंबर) पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। इस दौरान आमतौर पर व्यूअरशिप बढ़ जाती है और विज्ञापन खर्च भी अपने चरम पर होता है।
रियलिटी शोज पर सबसे ज्यादा असर
'कौन बनेगा करोड़पति' और 'बिग बॉस' जैसे बड़े रियलिटी शोज, जो आमतौर पर प्रीमियम एड रेट्स चार्ज करते हैं, इस डेटा गैप से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। इन शोज के लिए कॉरपोरेट स्पॉन्सर्स के साथ डील फाइनल करने के लिए ऑब्जेक्टिव परफॉर्मेंस मेट्रिक्स की ज़रूरत होती है। रेटिंग्स के बिना, 'कॉस्ट पर रेटिंग पॉइंट' (CPRP) के आधार पर डील करने का स्टैंडर्ड तरीका रुक गया है। विज्ञापनदाता अब स्टैंडर्ड डील्स पर 30% से 40% तक की छूट मांग रहे हैं, जिससे मौजूदा कॉर्पोरेट रेट्स, जो अक्सर ₹1.75 लाख और ₹2 लाख प्रति स्लॉट के बीच होते हैं, पर दबाव बढ़ रहा है।
बदलते मीडिया माहौल में चुनौतियाँ
यह रेटिंग्स का संकट ऐसे समय में आया है जब पूरा मीडिया इकोसिस्टम एक बड़े स्ट्रक्चरल शिफ्ट से गुज़र रहा है। विज्ञापनदाता अब अपना खर्च बांट रहे हैं और ट्रेडिशनल लीनियर टीवी से कनेक्टेड टीवी (CTV), ओवर-द-टॉप (OTT) प्लेटफॉर्म्स और क्विक कॉमर्स एडवरटाइजिंग की ओर जा रहे हैं। इन नए डिजिटल चैनल्स पर स्टैंडर्डाइज्ड डेटा की कमी और टीवी रेटिंग्स के ब्लैकआउट की वजह से, ब्रांड्स के लिए अपने निवेश पर रिटर्न मापना और भी मुश्किल हो गया है। रेटिंग्स के विश्वसनीय बेंचमार्क न होने के कारण, अब मीडिया हाउसेज और विज्ञापनदाताओं के बीच के रिश्ते ही एड डील्स तय करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
ब्रॉडकास्टर्स पर वित्तीय दबाव
यह सब तब हो रहा है जब टीवी सेगमेंट पहले से ही कमजोर वित्तीय प्रदर्शन से जूझ रहा है। FICCI-EY रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में लीनियर टीवी एडवरटाइजिंग रेवेन्यू में 10.3% की गिरावट आई है, और कुल एड वॉल्यूम में 11.5% की कमी देखी गई है। हिंदी एंटरटेनमेंट चैनल्स खासतौर पर ज़्यादा प्रभावित हुए हैं, जिनके एडवरटाइजिंग रेवेन्यू में 18% की गिरावट दर्ज की गई है। करीब ₹40,000 करोड़ के टीवी एडवरटाइजिंग मार्केट पर फास्ट-मूविंग कंज्यूमर गुड्स (FMCG) कंपनियों द्वारा खर्च में की गई भारी कटौती का भी असर दिख रहा है। FMCG कंपनियां, जो आमतौर पर टीवी एड रेवेन्यू का सबसे बड़ा हिस्सा होती हैं, ने कथित तौर पर अपने टीवी बजट में 20% से 30% की कटौती कर उन्हें डिजिटल और क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर डायवर्ट कर दिया है।
