Reliance Industries की मीडिया हेड, ज्योति देसाई ने हाल ही में फिल्म 'धुरंधर' की सफलता के पीछे की खास रणनीति का खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि कैसे अनोखी कहानी कहने के तरीके और प्रोडक्शन के समझदारी भरे फैसलों ने इस फिल्म को इतना सफल बनाया।
'धुरंधर' बनी दो-भागों की फ्रैंचाइज़ी: एक सोची-समझी चाल
Reliance Industries की मीडिया और कंटेंट बिजनेस की प्रेसिडेंट, ज्योति देसाई, ने एक मीडिया इंडस्ट्री इवेंट में फिल्म 'धुरंधर' की सफलता को लेकर खास बातें बताईं। उन्होंने बताया कि 'धुरंधर' को शुरू में दो-भागों वाली फ्रैंचाइज़ी बनाने का प्लान नहीं था। लेकिन प्रोडक्शन के दौरान, टीम को लगा कि कहानी का दायरा उम्मीद से काफी बड़ा हो गया है।
एक लंबी 5 घंटे की फिल्म बनाने के बजाय, मैनेजमेंट ने इसे दो अलग-अलग हिस्सों में बांटने का फैसला किया। इस बड़े फैसले के लिए अतिरिक्त फंड की ज़रूरत पड़ी, ताकि दोनों फिल्मों की क्वालिटी बनी रहे और वे समय पर पूरी हो सकें।
लागत बचाने के अनोखे तरीके
कहानी के बड़े स्केल को संभालने के लिए प्रोडक्शन टीम ने कुछ खास कॉस्ट-कटिंग तरीके भी अपनाए। उदाहरण के लिए, उन्होंने थाईलैंड में कराची के 'लयारी' इलाके को फिर से बनाया। इसके लिए उन इमारतों का इस्तेमाल किया गया जिन्हें पहले से ही गिराने के लिए मार्क किया गया था। इस तरह, सेट बनाने का खर्च काफी कम हो गया।
निवेशकों के लिए ऐसे ऑपरेशनल फैसले बहुत अहम हैं, क्योंकि ये सीधे तौर पर बड़े बजट वाले कंटेंट प्रोजेक्ट्स की फाइनेंशियल परफॉरमेंस और रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट (ROI) पर असर डालते हैं।
मीडिया सेक्टर में Reliance की बढ़ती पकड़
Reliance Industries मीडिया और एंटरटेनमेंट सेक्टर में तेज़ी से अपनी मौजूदगी बढ़ा रही है। कंपनी का लक्ष्य एक ऐसा पोर्टफोलियो तैयार करना है जो पारंपरिक फिल्मों के साथ-साथ नए और एक्सपेरिमेंटल कंटेंट को भी शामिल करे। देसाई का 'पैटर्न-ब्रेकिंग' कहानियों पर ज़ोर देना दिखाता है कि कंपनी मेनस्ट्रीम से अलग हटकर कुछ नया करना चाहती है।
इस रणनीति का मकसद ऑडियंस एंगेजमेंट को बढ़ाना है, जो मीडिया प्लेटफॉर्म्स और प्रोडक्शन हाउस के लिए कमाई का एक अहम ज़रिया है।
निवेशकों के लिए क्या है ज़रूरी?
ऐसे प्रोजेक्ट्स की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि कंपनी प्रोडक्शन कॉस्ट को कितनी कुशलता से कंट्रोल करती है और कंटेंट की क्वालिटी बनाए रखती है। मीडिया में निवेश में ऑडियंस की बदलती पसंद, प्रोडक्शन में देरी और लागत जैसे जोखिम हमेशा बने रहते हैं।
फ्रैंचाइज़ी मॉडल बनाने से लंबे समय तक स्थिर कमाई हो सकती है, लेकिन इसके लिए कैपिटल को समझदारी से इस्तेमाल करना ज़रूरी है ताकि बजट बढ़ न जाए। भविष्य में, निवेशकों को यह देखना होगा कि क्या कंपनी आने वाले कंटेंट के लिए भी यही प्रोडक्शन एफिशिएंसी बनाए रख पाती है। फ्रैंचाइज़ी-आधारित मॉडल की परफॉरमेंस इस बिज़नेस स्ट्रेटेजी की सस्टेनेबिलिटी का एक बड़ा इंडिकेटर होगी।
