Quick Commerce Ad Spend: 2026 तक **24%** की छलांग! भारतीय विज्ञापन बाजार में बड़ा बदलाव

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Quick Commerce Ad Spend: 2026 तक **24%** की छलांग! भारतीय विज्ञापन बाजार में बड़ा बदलाव

भारतीय विज्ञापन बाजार में बड़ा उलटफेर देखने को मिल रहा है! कंपनियां अब Blinkit और Zepto जैसे क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर दांव लगा रही हैं। डिजिटल मीडिया का दबदबा **68%** से ज्यादा हो गया है, जिससे ब्रांड्स पुराने तरीकों से हटकर सीधे खरीद वाले माध्यमों की ओर बढ़ रहे हैं। हालांकि, अनिश्चित आर्थिक माहौल और टीवी रेटिंग डेटा की कमी के कारण कंपनियां अपने कुल मार्केटिंग बजट को लेकर सतर्क हैं।

क्विक कॉमर्स का बढ़ता दबदबा

भारतीय विज्ञापन क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव आ रहा है। कंपनियां अब क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर अपने विज्ञापन खर्च को बढ़ा रही हैं। WPP की 'This Year Next Year' 2026 रिपोर्ट के अनुसार, इस साल कॉमर्स-आधारित विज्ञापन सबसे तेजी से बढ़ने वाला सेगमेंट रहने की उम्मीद है, जिसमें 24.2% की वृद्धि का अनुमान है। यह दिखाता है कि ब्रांड्स अब ग्राहकों को ठीक खरीदारी के समय प्रभावित करने का लक्ष्य बना रहे हैं, न कि केवल पारंपरिक ब्रांड-बिल्डिंग पर निर्भर रह रहे हैं।

डिजिटल की बढ़त और बदलते मीडिया हैबिट्स

जैसे-जैसे भारतीय विज्ञापन बाजार ₹2 ट्रिलियन के आंकड़े की ओर बढ़ रहा है, डिजिटल चैनलों ने कुल विज्ञापन आय में 68.1% की भारी हिस्सेदारी हासिल कर ली है। क्विक कॉमर्स ऐप, जो पहले सिर्फ ग्रॉसरी डिलीवरी करते थे, अब ब्यूटी, इलेक्ट्रॉनिक्स और रोजमर्रा की ज़रूरतों जैसी कैटेगरीज में भी अपनी पहुंच बढ़ा चुके हैं। इस बदलाव ने ब्रांड्स को एक ही क्रिएटिव अप्रोच से हटकर, शॉपिंग ऐप, सर्च इंजन और सोशल मीडिया जैसे विशिष्ट प्लेटफॉर्म के लिए विज्ञापन के कई वर्जन बनाने पर मजबूर किया है।

प्रीमियम विज्ञापन स्थानों में वृद्धि

क्विक कॉमर्स के अलावा, कुछ अन्य चैनल भी खास दर्शकों तक पहुंचने के लिए महत्वपूर्ण हो रहे हैं। कनेक्टेड टीवी (CTV) एक प्रीमियम स्पेस के रूप में उभरा है, जो वर्तमान में भारत में लगभग 6 करोड़ यूजर्स तक पहुंच रहा है, जो पारंपरिक केबल की तुलना में स्ट्रीमिंग को पसंद करते हैं। इसके अतिरिक्त, एयरपोर्ट और मेट्रो स्टेशनों जैसे हाई-ट्रैफिक स्थानों पर आउटडोर विज्ञापन उन ब्रांडों को आकर्षित कर रहे हैं जो व्यस्त और संपन्न ग्राहकों तक पहुंचना चाहते हैं। डिजिटल और इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) जैसे स्पोर्ट्स-आधारित मार्केटिंग के बावजूद, पारंपरिक प्रिंट मीडिया भी अपनी जगह बनाए हुए है। ऑटोमोबाइल, शिक्षा और रियल एस्टेट जैसे क्षेत्र अभी भी क्षेत्रीय प्रकाशनों पर भरोसा करते हैं।

आर्थिक दबाव और मापन के जोखिम

डिजिटल कॉमर्स विज्ञापन में वृद्धि तो स्पष्ट है, लेकिन पूरा उद्योग मैक्रोइकॉनॉमिक फैक्टर से महत्वपूर्ण दबाव झेल रहा है। भू-राजनीतिक तनाव और बढ़ती लागत के कारण कई कंपनियां अपने मार्केटिंग बजट पर कड़ी नजर रख रही हैं, जिससे इस साल के समग्र विकास के अनुमानों पर असर पड़ सकता है। उद्योग के लिए एक बड़ी चुनौती आधिकारिक टीवी ऑडियंस डेटा की अनुपस्थिति बनी हुई है, क्योंकि BARC टीवी रेटिंग सिस्टम वर्तमान में रुका हुआ है। इन आधिकारिक बेंचमार्क के बिना, विज्ञापनदाता टेलीविजन अभियानों के लिए सटीक बजट निर्णय लेने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, और अक्सर पुराने ऐतिहासिक डेटा या वैकल्पिक मेट्रिक्स पर भरोसा कर रहे हैं। निवेशकों और हितधारकों को इन मापन गैप्स और लागत-नियंत्रण उपायों का मीडिया हाउस और विज्ञापन एजेंसियों के राजस्व वृद्धि पर पड़ने वाले प्रभाव पर नज़र रखनी चाहिए।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.