साउथ सुपरस्टार Ram Charan की नई फिल्म 'Peddi' ने भारतीय बॉक्स ऑफिस पर पहले ही हफ्ते में ₹184.14 करोड़ का नेट कलेक्शन कर लिया है। फिल्म की कमाई में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की मांग मजबूत है, लेकिन ₹350 करोड़ के भारी प्रोडक्शन बजट के चलते इसे रफ्तार बनाए रखने का दबाव झेलना पड़ रहा है।
'Peddi' ने मचाया धमाल, पहले हफ्ते ₹184 करोड़ का कलेक्शन!
Ram Charan की 'Peddi' रिलीज के सात दिनों के अंदर ही भारतीय बॉक्स ऑफिस पर ₹184.14 करोड़ का नेट कलेक्शन करने में सफल रही है। हालांकि, फिल्म का प्रदर्शन अलग-अलग इलाकों में बंटा हुआ नजर आ रहा है। सबसे ज्यादा कमाई इसके घरेलू गढ़, यानी आंध्र प्रदेश और तेलंगाना से हुई है। लेकिन, हिंदी और तमिल जैसी अन्य भाषाओं के मार्केट में इसकी पहुंच उतनी खास नहीं रही।
₹350 करोड़ के बजट का बोझ
फिल्म इंडस्ट्री में, बड़े बजट की फिल्मों पर जल्द से जल्द लागत वसूलने का भारी दबाव होता है। 'Peddi' का प्रोडक्शन बजट करीब ₹350 करोड़ बताया जा रहा है, जिसके चलते इसे प्रॉफिट में आने के लिए बॉक्स ऑफिस पर लगातार अच्छा प्रदर्शन करना होगा। ₹184.14 करोड़ का कलेक्शन एक अच्छी शुरुआत है, लेकिन यह देखना होगा कि फिल्म कितनी जल्दी अपने प्रोडक्शन और डिस्ट्रीब्यूशन के खर्चे निकाल पाती है। फिल्म की कमाई का पूरा हिसाब सिर्फ थिएटर कलेक्शन से नहीं, बल्कि OTT (स्ट्रीमिंग) राइट्स, सैटेलाइट टीवी राइट्स और म्यूजिक लाइसेंसिंग जैसे नॉन-थिएट्रिकल डील्स से भी तय होगा।
रीजनल मार्केट पर निर्भरता एक रिस्क?
'Peddi' के बिजनेस की एक खास बात इसकी तेलुगू मार्केट पर भारी निर्भरता है। विशाखापत्तनम और वारंगल जैसे शहरों में दर्शकों की भारी भीड़ इस बात का सबूत है कि फिल्म का अपने मुख्य दर्शकों से मजबूत जुड़ाव है। वहीं, हिंदी वर्जन में ऑक्यूपेंसी कम देखी गई। मीडिया और एंटरटेनमेंट कंपनियों के लिए, किसी एक खास रीजन पर इतना ज्यादा निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है। ऐसे में, किसी भी लोकल डिमांड में कमी का सीधा असर फिल्म पर पड़ सकता है। इतने बड़े बजट की फिल्म से पूरी कमाई निकालने के लिए पैन-इंडिया अपील का होना अक्सर जरूरी होता है।
बड़े बजट की फिल्मों के रिस्क
'बिग-टिकट' प्रोजेक्ट्स को हमेशा एग्जीक्यूशन और मार्केट रिस्क का सामना करना पड़ता है। अगर फिल्म पहले हफ्ते के बाद अपनी रफ्तार खो देती है, तो प्रॉफिट कमाना मुश्किल हो जाता है। इन फिल्मों के लिए सबसे बड़ा रिस्क यह है कि अगर कलेक्शन में गिरावट (ड्रॉप) बहुत तेज होती है, तो यह संकेत मिलता है कि माउथ पब्लिसिटी (Word-of-mouth) नए दर्शकों को आकर्षित करने में नाकाम रही है। एंटरटेनमेंट सेक्टर में बढ़ती गलाकाट प्रतिस्पर्धा के चलते, फिल्मों के पास मार्केट शेयर कैप्चर करने के लिए एक सीमित समय होता है, इससे पहले कि अगली बड़ी फिल्म रिलीज हो जाए।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
फिल्म प्रोजेक्ट्स की फाइनेंशियल हेल्थ पर नजर रखने वालों के लिए, अगले महत्वपूर्ण आंकड़े दूसरे वीकेंड का प्रदर्शन और वीकेंड के बाद कलेक्शन में स्थिरता देखना होगा। अगर दूसरे हफ्ते कलेक्शन में बड़ी गिरावट आती है, तो यह इशारा कर सकता है कि फिल्म का आकर्षण सिर्फ शुरुआती फैन बेस तक ही सीमित है। वहीं, स्थिर प्रदर्शन यह बताएगा कि फिल्म की पहुंच व्यापक है। प्रोडक्शन और डिस्ट्रीब्यूशन इकोसिस्टम में निवेशक आमतौर पर यह देखते हैं कि फिल्म अपने ब्रेक-ईवन पॉइंट (जहां प्रोडक्शन कॉस्ट पूरी तरह वसूल हो जाती है) को कब पार करती है। भविष्य में ग्लोबल मार्केट में फिल्म के प्रदर्शन या डिजिटल स्ट्रीमिंग लॉन्च से जुड़ी खबरें इस प्रोजेक्ट की कुल कमाई क्षमता का अहम इंडिकेटर होंगी।
