संसदीय समिति (Parliamentary Committee) अब प्रिंट, टीवी और डिजिटल मीडिया के लिए एक ही रेगुलेटरी बॉडी बनाने की संभावनाओं पर विचार कर रही है। सरकार का यह कदम एडमिनिस्ट्रेटिव उलझनें कम करने के लिए है, लेकिन इससे मीडिया कंपनियों के लिए कंप्लायंस के नए नियम और चुनौतियां भी पैदा हो सकती हैं।
रेगुलेटरी फ्रिक्शन को खत्म करने की कवायद
अब तक मीडिया कंपनियां सूचना और प्रसारण मंत्रालय (MIB) और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के मिले-जुले नियमों के जाल में फंसी रही हैं। कई बार दोनों मंत्रालयों के ओवरलैपिंग नियमों के कारण कंटेंट और ग्रीवांस रिड्रेसल (शिकायत निवारण) को लेकर कानूनी पेच फंसते रहे हैं। एक सिंगल रेगुलेटरी फ्रेमवर्क के जरिए सरकार अब एक समान पॉलिसी एनवायरमेंट तैयार करना चाहती है। यह कदम मार्च 2025 में मिली उन सिफारिशों का हिस्सा है, जिनमें सभी मीडिया सेगमेंट के लिए एकीकृत गवर्नेंस की बात कही गई थी।
मीडिया ऑपरेशंस पर क्या होगा असर?
सितंबर 2026 में MIB ने 'टेलीकम्युनिकेशन (टेलीविजन, रेडियो और एसोसिएटेड सर्विसेज) रूल्स, 2026' का ड्राफ्ट जारी किया है। यह 'टेलीकम्युनिकेशन एक्ट, 2023' के तहत रेगुलेटरी ढांचे को सरल बनाने की एक बड़ी रणनीति है। हालांकि लंबे समय में एक रेगुलेटर से कामकाज आसान हो सकता है, लेकिन शॉर्ट-टर्म में कंपनियों को अपने इंटरनल प्रोसेस बदलने होंगे, जिससे कंप्लायंस कॉस्ट में बढ़ोतरी की संभावना है।
निवेशकों के लिए रिस्क और आउटलुक
मीडिया सेक्टर में इस तरह के बदलाव अनिश्चितता का दौर ला सकते हैं। अगर नया 'मीडिया बिल' लागू होता है, तो OTT प्लेटफॉर्म्स के लिए कंटेंट की सख्त जांच, उम्र सत्यापन (Age Verification) और रिव्यू पैनल जैसे नए नियम आ सकते हैं। साथ ही, नए रिपोर्टिंग नियम और नॉन-कंप्लायंस पर भारी जुर्माने का डर कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन पर दबाव डाल सकता है। निवेशकों की नजर अब इस बात पर टिकी है कि सरकार इस ड्राफ्ट कानून को किस तरह लागू करती है और प्रमुख मीडिया हाउसेज अपने बिजनेस मॉडल को कैसे एडजस्ट करते हैं।
