संसदीय समिति ने Meta के अधिकारियों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक वीडियो को हटाए जाने के मामले पर पूछताछ की है। समिति ने कंपनी के 'तकनीकी खराबी' वाले स्पष्टीकरण को खारिज कर दिया और जवाबदेही मांगी है। यह घटना भारत में डिजिटल प्लेटफॉर्म की कंटेंट मॉडरेशन नीतियों पर बढ़ते नियामक दबाव को दर्शाती है।
Meta से तीखे सवाल
सोमवार को संचार और सूचना प्रौद्योगिकी पर बनी संसदीय स्थायी समिति ने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की कंटेंट मॉडरेशन (content moderation) की नीतियों पर बड़ी सख्ती दिखाई। बैठक का मुख्य एजेंडा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फेसबुक (Facebook) से एक वीडियो का हटाया जाना था। यह वीडियो परीक्षा पेपर लीक से निपटने के सरकारी प्रयासों पर था, जिसे 28 जुलाई को हटाया गया और फिर जल्द ही वापस पोस्ट कर दिया गया। Meta के प्रतिनिधियों को इस मामले पर पैनल के सामने पेश होकर सफाई देनी पड़ी।
'तकनीकी खराबी' पर समिति का असंतोष
Meta के अधिकारियों ने समिति को बताया कि वीडियो को एक तकनीकी खराबी (technical error) के कारण हटाया गया था। लेकिन, बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे की अगुवाई वाली समिति के सदस्य इस जवाब से बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं दिखे। सांसदों ने जोर देकर कहा कि सिर्फ माफी मांगना काफी नहीं होगा और कंपनी को इस चूक के लिए स्पष्ट जवाबदेही तय करनी होगी। कुछ सदस्यों ने तो यहां तक कहा कि गलती करने वाली टीमों या अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (Ministry of Electronics and Information Technology) ने भी Meta के शुरुआती स्पष्टीकरण को संतोषजनक नहीं माना है, जिससे यह साफ है कि सरकार इन ऑटोमेटेड सिस्टम के काम करने के तरीके को गहराई से समझना चाहती है।
डिजिटल रेगुलेशन पर असर
यह बैठक सोशल और डिजिटल मीडिया कंपनियों तथा भारत में उनके रेगुलेटरी फ्रेमवर्क के व्यापक परीक्षण का हिस्सा थी। Meta के अलावा, Google, X (पहले ट्विटर), Snapchat और YouTube जैसी अन्य बड़ी कंपनियों के प्रतिनिधि भी कंटेंट मॉडरेशन नीतियों पर चर्चा के लिए मौजूद थे। सरकार का मुख्य जोर यह सुनिश्चित करने पर है कि ये प्लेटफॉर्म्स संवेदनशील या जनहित के कंटेंट को होस्ट करने के संबंध में पारदर्शिता बनाए रखें और स्थापित नियमों का पालन करें।
निवेशकों और स्टेकहोल्डर्स के लिए, यह घटना भारत में काम करने वाली वैश्विक टेक्नोलॉजी फर्मों पर बढ़ते नियामक दबाव को रेखांकित करती है। इंडस्ट्री के लिए मुख्य बात यह होगी कि ये प्लेटफॉर्म्स अपने ऑटोमेटेड मॉडरेशन टूल्स को स्थानीय नियामक अपेक्षाओं के अनुरूप कैसे ढालते हैं। भविष्य में, ऐसे सरकारी दिशानिर्देश या अनुपालन आवश्यकताएं आ सकती हैं जो भारतीय बाजार में इन कंपनियों के संचालन और कंटेंट रणनीतियों को प्रभावित कर सकती हैं।
