Digital News Publishers Association (DNPA) ने भारत के Digital Personal Data Protection (DPDP) एक्ट को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। इसमें Reliance और Adani ग्रुप से जुड़ी मीडिया कंपनियां शामिल हैं, जो इसे पत्रकारिता की स्वतंत्रता के लिए बड़ा खतरा मान रही हैं।
देश के 21 बड़े मीडिया संस्थानों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था, Digital News Publishers Association (DNPA) ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की है। यह कानूनी लड़ाई मई 2027 में लागू होने वाले Digital Personal Data Protection (DPDP) एक्ट के प्रावधानों के खिलाफ है। इस एसोसिएशन में Reliance Industries के नियंत्रण वाली Network18 और Adani Group की स्वामित्व वाली NDTV जैसी प्रमुख कंपनियां शामिल हैं।
पत्रकारिता पर क्या पड़ेगा असर?
मीडिया घरानों का सबसे बड़ा डर यह है कि मौजूदा कानून में प्रेस के लिए कोई विशेष सुरक्षा (Safeguards) नहीं दी गई है। कानून के सख्त नियमों के कारण पत्रकारों को डेटा जुटाने से पहले संबंधित व्यक्ति को सूचित करना पड़ सकता है। पब्लिशर्स का तर्क है कि इससे जांच प्रभावित होगी और आरोपी सबूत मिटाने या व्हिसलब्लोअर्स को डराने में सफल हो सकते हैं।
डेटा इरेजर और सरकारी दखल का डर
विवाद का एक बड़ा मुद्दा 'डेटा इरेजर' (Data Erasure) का प्रावधान है। यदि बिना किसी स्पष्ट अपवाद के कोई व्यक्ति अपना डेटा हटाने की मांग करता है, तो मीडिया हाउस को अपनी पुरानी और मौजूदा खोजी रिपोर्टों से महत्वपूर्ण जानकारी हटानी पड़ सकती है। इसके अलावा, सरकार को मिली शक्तियां यह चिंता पैदा करती हैं कि अधिकारियों द्वारा जानकारी मांगे जाने पर पत्रकारों को अपने गोपनीय सूत्रों (Confidential Sources) का खुलासा करने के लिए मजबूर किया जा सकता है।
निवेशकों के लिए क्यों है अहम?
यह मामला लिस्टेड मीडिया कंपनियों के लिए एक बड़े ऑपरेशनल रिस्क की तरह है। यदि कानून में बदलाव नहीं होता है, तो कंपनियों को भविष्य में अधिक कंप्लायंस कॉस्ट (Compliance Cost) और कानूनी बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला तय करेगा कि आने वाले समय में प्राइवेसी और प्रेस की आजादी के बीच संतुलन कैसे बनेगा।
