Knot Dating CEO की पोस्ट पर छिड़ी बहस: क्या Gen Z कर्मचारियों को मिलेगी मेंस्ट्रुअल लीव?

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Knot Dating CEO की पोस्ट पर छिड़ी बहस: क्या Gen Z कर्मचारियों को मिलेगी मेंस्ट्रुअल लीव?

Knot Dating के CEO Jasveer Singh ने जब एक Gen Z कर्मचारी के मेंस्ट्रुअल पेन (menstrual pain) की वजह से छुट्टी मांगने की रिक्वेस्ट सोशल मीडिया पर शेयर की, तो यह मामला चर्चा का विषय बन गया। भले ही यह स्टार्टअप लिस्टेड कंपनी न हो, लेकिन इस घटना ने वर्कप्लेस के बदलते नियमों, प्राइवेसी और भारत में मेंस्ट्रुअल लीव पॉलिसी पर बड़ी बहस छेड़ दी है।

AI-पावर्ड मैचमेकिंग प्लेटफॉर्म Knot Dating के को-फाउंडर और CEO, Jasveer Singh, ने वर्कप्लेस कम्युनिकेशन पर एक बड़ी पब्लिक डिबेट शुरू कर दी है। सिंह ने लिंक्डइन पर अपनी टेक टीम के एक कर्मचारी की लीव रिक्वेस्ट का स्क्रीनशॉट शेयर किया, जिसमें उसने पीरियड्स के दर्द और तकलीफ का साफ-साफ ज़िक्र किया था। इस पोस्ट ने Gen Z कर्मचारियों के सीधे बात करने के तरीके पर ध्यान खींचा, जिन्हें सिंह ने पारंपरिक वर्कप्लेस की झिझक को तोड़ने वाला बताया है।

चूंकि Knot Dating एक प्राइवेट, वेंचर-कैपिटल समर्थित स्टार्टअप है, इसलिए यह किसी भी स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्टेड नहीं है। ऐसे में, निवेशकों के लिए स्टॉक की कीमतों या फाइनेंशियल रिजल्ट्स जैसी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। लेकिन, यह घटना कॉर्पोरेट कल्चर और आज के वर्कफोर्स की बदलती उम्मीदों के लिए एक केस स्टडी ज़रूर बन गई है।

इस चर्चा के केंद्र में प्रोफेशनल ट्रांसपेरेंसी (transparency) और कर्मचारी की प्राइवेसी (privacy) के बीच का तनाव है। जहां कुछ लोगों ने इस कदम को बायोलॉजिकल प्रोसेस से जुड़े टैबू (taboo) को खत्म करने की दिशा में एक कदम बताया, वहीं दूसरों को चिंता है कि कहीं कर्मचारी अपनी अनुपस्थिति को सही ठहराने के लिए अपनी पर्सनल हेल्थ डिटेल्स बताने पर मजबूर न हो जाएं। बाद में, सिंह ने साफ किया कि कंपनी ऐसी विस्तृत जानकारी मांगने को मजबूर नहीं करती और यह हमेशा कर्मचारी पर निर्भर करता है कि वह कितनी जानकारी शेयर करना चाहता है। उन्होंने कहा कि मकसद लोगों को जानकारी देने के लिए मजबूर करना नहीं, बल्कि एक ऐसा माहौल बनाना है जहां स्वास्थ्य संबंधी अनुपस्थिति को दूसरी मेडिकल वजहों की तरह सामान्य माना जाए।

इस घटना ने भारत में मेंस्ट्रुअल लीव पॉलिसीज (menstrual leave policies) को लेकर चल रही जटिल बहस को भी फिर से सामने ला दिया है। कुछ देशों या कंपनियों के विपरीत, जहां मेंस्ट्रुअल लीव को अपनाया गया है, भारत में ऐसा कोई राष्ट्रीय कानून नहीं है जो पीरियड्स के लिए पेड लीव (paid leave) को अनिवार्य करता हो। यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचा है, जहां जजों ने कहा कि मेंस्ट्रुअल लीव को लेकर इंडस्ट्री-वाइड नियम बनाने के अनपेक्षित परिणाम हो सकते हैं, जैसे कि कंपनियों का महिलाओं को हायर करने से हिचकिचाना, क्योंकि उन्हें अतिरिक्त लागत या प्रोडक्टिविटी पर असर का डर हो सकता है।

बिजनेस लीडर्स और HR विभागों के लिए, यह घटना सहानुभूतिपूर्ण नीतियों और प्रोफेशनल सीमाओं को संतुलित करने की चुनौती को उजागर करती है। जैसे-जैसे कंपनियां एक मुखर युवा वर्कफोर्स के साथ तालमेल बिठा रही हैं, कॉर्पोरेट कल्चर पर नज़र रखने वालों के लिए मुख्य बात यह देखना है कि कंपनियां इन स्वास्थ्य संबंधी चर्चाओं को कैसे औपचारिक रूप देंगी। सवाल यह है कि क्या कंपनियां ज़्यादा फ्लेक्सिबल, भरोसे पर आधारित लीव पॉलिसी की ओर बढ़ेंगी या पारंपरिक, कम पारदर्शी सिक लीव (sick leave) सिस्टम पर ही टिकी रहेंगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.