भारत में म्यूजिक स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स अब टेलीकॉम और ई-कॉमर्स कंपनियों के साथ मिलकर 'बंडलिंग' रणनीति अपना रहे हैं। लक्ष्य 2025 के अंत तक रहे **1.4 करोड़** के सब्सक्राइबर बेस को तेजी से बढ़ाना है, लेकिन इसके सामने लाइसेंसिंग कॉस्ट की बड़ी चुनौती है।
भारत में म्यूजिक स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स अब सब्सक्रिप्शन की खाई को पाटने के लिए नई चाल चल रहे हैं। दिसंबर 2025 तक देश में पेड सब्सक्राइबर्स की संख्या केवल 1.4 करोड़ थी, जो वीडियो स्ट्रीमिंग के 20 करोड़ से ज्यादा के आंकड़े के मुकाबले काफी कम है। इसे बदलने के लिए ऐप्स अब टेलीकॉम और ई-कॉमर्स के साथ मिलकर अपने म्यूजिक प्लान को डेटा और शॉपिंग जैसे सर्विसेज के साथ 'बंडल' कर रहे हैं।
मोनेटाइजेशन का बड़ा गैप
भारत में चुनौती उपभोक्ता की सोच बदलने की है। सर्वे बताते हैं कि करीब 80% स्मार्टफोन यूजर्स रोजाना म्यूजिक सुनते हैं, लेकिन पेड प्लान लेने की दर बहुत कम है। EY-IMI की रिपोर्ट के अनुसार, केवल 38% यूजर्स ने कभी म्यूजिक सर्विस के लिए पैसे दिए हैं, जबकि वीडियो के लिए यह आंकड़ा 86% है। YouTube जैसे फ्री प्लेटफॉर्म्स की मौजूदगी के कारण म्यूजिक को 'मुफ्त की चीज' समझने की मानसिकता को तोड़ना कंपनियों के लिए सबसे कठिन काम है।
लाइसेंसिंग कॉस्ट का जोखिम
इन्वेस्टर्स को यह ध्यान रखना होगा कि यह मॉडल तब तक ही सफल है जब तक कंपनियां अपनी लागत को मैनेज कर सकें। म्यूजिक ऐप्स का बिजनेस मॉडल वीडियो प्लेटफॉर्म्स से अलग है, क्योंकि उन्हें कंटेंट के लिए म्यूजिक लेबल्स को 'रेवेन्यू-शेयर' या 'पर-स्ट्रीम' फीस देनी पड़ती है। अगर बंडलिंग से यूजर्स तो बढ़ गए लेकिन डिस्काउंट के कारण रेवेन्यू कम रहा, तो लाइसेंसिंग कॉस्ट मार्जिन को पूरी तरह खत्म कर सकती है। इसी को देखते हुए Spotify जैसी कंपनियां अब तीन-स्तरीय (three-tier) प्राइसिंग स्ट्रक्चर पर काम कर रही हैं।
आगे क्या होगा?
इंडस्ट्री का लक्ष्य 2028 तक पेड सब्सक्राइबर्स को 2.8 से 3 करोड़ तक ले जाने का है। असली मुकाबला केवल सब्सक्रिप्शन बेचने का नहीं, बल्कि उन्हें 'रिटेन' (बरकरार रखने) का है। क्या कंपनियां म्यूजिक को केवल 'फ्री कमोडिटी' से ऊपर उठाकर लाइव इवेंट्स और एक्सक्लूसिव कंटेंट जैसी वैल्यू दे पाएंगी? अगले कुछ क्वार्टर्स में यही तय करेगा कि यह स्ट्रीमिंग सेक्टर प्रॉफिटेबल होगा या केवल एक डिस्काउंट-आधारित गेम बनकर रह जाएगा।
