भारत का माइक्रोड्रामा सेक्टर तेजी से उभर रहा है। फाइनेंशियल ईयर **2026** में इस इंडस्ट्री ने **₹2,300 करोड़** का रेवेन्यू दर्ज किया है, लेकिन कस्टमर एक्विजिशन कॉस्ट बढ़ने से कंपनियों के लिए मुनाफा कमाना मुश्किल हो रहा है।
भारत के डिजिटल एंटरटेनमेंट स्पेस में माइक्रोड्रामा एक बड़े गेम-चेंजर के रूप में उभरा है। 40 मिलियन सब्सक्राइबर्स के साथ, यह इंडस्ट्री अब ₹2,300 करोड़ के मुकाम पर पहुंच चुकी है। हालांकि, इतने बड़े यूजर बेस के बावजूद कंपनियां प्रॉफिटेबिलिटी के जाल में फंसी हुई हैं। अभी रेवेन्यू का 99% हिस्सा सब्सक्रिप्शन और पे-वॉल से आ रहा है, जो ऊंचे ऑपरेशनल खर्चों के सामने कम पड़ रहा है।
मार्केटिंग कॉस्ट का चक्रव्यूह
मुनाफे में सबसे बड़ी बाधा मार्केटिंग खर्च है। करीब 89% दर्शक सोशल मीडिया के जरिए कंटेंट तक पहुंचते हैं, जिससे कंपनियों को मार्केटिंग पर भारी बजट फूंकना पड़ता है। यह खर्च कंटेंट की लो-कॉस्ट प्रोडक्शन के फायदों को पूरी तरह खत्म कर रहा है।
प्रोडक्शन में एआई (AI) का जादू
मार्जिन सुधारने के लिए Zee Entertainment, Balaji Telefilms, और Applause Entertainment जैसी बड़ी कंपनियां अपनी पुरानी कंटेंट लाइब्रेरी का इस्तेमाल कर रही हैं। एआई (AI) के इस्तेमाल से प्रोडक्शन लागत में लगभग 25% की कमी आई है और अब एक औसत सीरीज का खर्च ₹2.5 लाख से ₹5 लाख के बीच आ गया है।
एड-सपोर्टेड मॉडल की ओर कदम
फाइनेंशियल ईयर 2032 तक ₹25,500 करोड़ का लक्ष्य हासिल करने के लिए कंपनियां अब पूरी तरह से सब्सक्रिप्शन मॉडल पर निर्भर नहीं रहना चाहतीं। अब AVOD यानी एड-सपोर्टेड मॉडल पर जोर दिया जा रहा है। आने वाले समय में निवेशकों की नजर इस बात पर होगी कि क्या कंपनियां ग्राहकों को खोए बिना विज्ञापन के जरिए रेवेन्यू बैलेंस कर पाती हैं या नहीं।
