भारत का माइक्रो-ड्रामा उद्योग तेजी से बदल रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, FY32 तक यह मार्केट **₹25,500 करोड़** तक पहुंच सकता है, जिसके पीछे का मुख्य कारण विज्ञापन-आधारित मॉडल (AVOD) की ओर झुकाव है।
भारत के मीडिया और एंटरटेनमेंट सेक्टर में एक नया ट्रेंड तेजी से उभर रहा है, जिसे 'माइक्रो-ड्रामा' कहा जा रहा है। Redseer Strategy Consultants के आंकड़ों के मुताबिक, अगले कुछ सालों में यह इंडस्ट्री ₹23,500 करोड़ से ₹25,500 करोड़ तक की बड़ी वैल्यू छू सकती है। अब तक ज्यादातर प्लेटफॉर्म सब्सक्रिप्शन मॉडल पर निर्भर थे, लेकिन अब वे 'हाइब्रिड' मॉडल अपना रहे हैं, जहां एड-सपोर्टेड वीडियो-ऑन-डिमांड (AVOD) पर जोर दिया जा रहा है।
विज्ञापनों पर क्यों बढ़ रहा है जोर?
प्लेटफॉर्म्स को समझ आ गया है कि सिर्फ पैसे देने वाले सब्सक्राइबर्स के दम पर बड़ा यूजर बेस नहीं बन सकता। भारत के 250-280 मिलियन डिजिटल कंज्यूमर्स मुफ्त और विज्ञापन वाले कंटेंट के आदी हैं। कंपनियों का लक्ष्य FY32 तक 140-150 मिलियन डेली एक्टिव यूजर्स को अपने साथ जोड़ना है। इसके लिए माइक्रो-ड्रामा सबसे बेहतरीन टूल है, क्योंकि इसे बनाना काफी सस्ता है। एक एपिसोड का खर्च मात्र ₹20,000 से ₹50,000 के बीच आता है, जिसमें जेनरेटिव AI (Generative AI) का इस्तेमाल करके स्क्रिप्टिंग और पोस्ट-प्रोडक्शन को और भी सस्ता बनाया जा रहा है।
निवेशकों के लिए चुनौतियां
हालांकि यह सेक्टर चमक रहा है, लेकिन निवेशकों को सतर्क रहने की भी जरूरत है। इस बिजनेस में प्रॉफिटेबिलिटी का रास्ता अभी साफ नहीं है। एड रेवेन्यू पूरी तरह से यूजर एंगेजमेंट पर टिका होता है, जो काफी अस्थिर हो सकता है। साथ ही, भुगतान में आने वाली समस्याएं और UPI-ऑटोपे पर निर्भरता रेवेन्यू कलेक्शन को मुश्किल बनाती है। मार्केट में सोशल मीडिया और बड़ी OTT कंपनियों से मिल रही कड़ी टक्कर और सरकारी रेगुलेशन (Content Regulation) भी इस सेक्टर के लिए आगे चलकर बड़ी चुनौती बन सकते हैं।
