क्या है सरकार का नया फरमान?
केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने साफ कर दिया है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को कंटेंट क्रिएटर्स के साथ अपनी कमाई का एक 'न्यायसंगत' हिस्सा बांटना होगा। न्यूज पब्लिशर्स से लेकर इन्फ्लुएंसर्स और शिक्षाविदों तक, सभी क्रिएटर्स को उनके काम का उचित मूल्य मिलना चाहिए। मंत्री ने कहा कि कंपनियां अपनी नीतियों में स्वेच्छा से बदलाव लाएं तो बेहतर है, लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ तो भारत सरकार कानूनी रास्ते अपनाने से पीछे नहीं हटेगी, जिसके लिए अंतर्राष्ट्रीय मिसालों का भी हवाला दिया गया है। यह कदम ऐसे समय में आया है जब OpenAI जैसी AI फर्मों पर कॉपीराइट सामग्री का अनधिकृत उपयोग करके AI मॉडल को ट्रेन करने को लेकर दुनियाभर में बहस और कानूनी चुनौतियां चल रही हैं।
AI कंपनियों के वैल्यूएशन पर क्यों पड़ेगा असर?
AI कंपनियां, जैसे कि OpenAI, इन दिनों भारी-भरकम फंडिंग जुटा रही हैं। हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, वे $800 अरब से $850 अरब डॉलर के भारी-भरकम वैल्यूएशन पर $100 अरब डॉलर तक का नया फंड जुटा सकती हैं। इस सब का मुख्य कारण AI के अत्याधुनिक मॉडल को बनाने और इंफ्रास्ट्रक्चर पर होने वाला भारी खर्च है। OpenAI का अनुमान है कि 2025 से 2030 के बीच मॉडल ट्रेनिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर पर $450 अरब डॉलर से ज्यादा खर्च हो सकते हैं।
अब सरकार की इस मांग के बाद, डेटा हासिल करने की लागत काफी बढ़ सकती है। Alphabet (Google) और Meta जैसी टेक दिग्गजों का मार्केट कैप खरबों डॉलर में है, जिनका P/E रेश्यो फरवरी 2026 तक लगभग 28.7 और 27.3 था। वहीं, Microsoft, जिसका वैल्यूएशन लगभग $2.98 खरब डॉलर और P/E रेश्यो करीब 25.1 है, AI स्पेस में गहराई से निवेश कर रहा है। इन कंपनियों का भारी-भरकम वैल्यूएशन, जो काफी हद तक AI से जुड़ी ग्रोथ की उम्मीदों पर टिका है, नए रेगुलेटरी नियमों और बढ़ती लागतों के कारण दबाव में आ सकता है।
यह सिर्फ भारत की बात नहीं, दुनिया का ट्रेंड है
भारत का यह रुख किसी एक देश तक सीमित नहीं है। ऑस्ट्रेलिया (News Media Bargaining Code) और कनाडा (Online News Act) जैसे देश पहले ही ऐसे कानून ला चुके हैं, जो प्लेटफॉर्म्स को न्यूज पब्लिशर्स को भुगतान करने के लिए मजबूर करते हैं। यूरोपीय संघ का डिजिटल सर्विसेज एक्ट (Digital Services Act) भी कड़े नियमों का पालन करने के लिए कहता है, जिसमें गैर-अनुपालन पर वैश्विक रेवेन्यू का 6% तक जुर्माना लग सकता है। यह सब दर्शाता है कि दुनिया भर में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर शिकंजा कस रहा है।
पहले भी ऐसी तनातनी देखी गई है, जब Google और Meta जैसे प्लेटफॉर्म्स पर एड मार्केट में दबदबा बनाने और न्यूज आउटलेट्स को रेवेन्यू से वंचित करने के आरोप लगे थे। अनुमान है कि अगर उचित रेवेन्यू शेयरिंग मॉडल लागू हो तो Google और Meta पर हर साल अमेरिकी पब्लिशर्स का अरबों डॉलर बकाया हो सकता है। इसी को देखते हुए, कई टेक कंपनियां पब्लिशर्स के साथ लाइसेंसिंग डील्स कर रही हैं, जिससे उन्हें कानूनी रूप से स्वीकार्य डेटासेट का एक्सेस मिल सके।
लागत बढ़ेगी, वैल्यूएशन घटेगा?
रेवेन्यू शेयरिंग के सख्त नियमों का सीधा मतलब है कि प्लेटफॉर्म्स और AI डेवलपर्स के ऑपरेटिंग खर्चों में भारी बढ़ोतरी होगी। जो कंपनियां अब तक ओपन वेब से आसानी से उपलब्ध डेटा पर निर्भर थीं, उन्हें अब भुगतान की बड़ी नई जिम्मेदारियां उठानी होंगी। इससे प्रॉफिट मार्जिन कम हो सकता है, खासकर उन नए AI वेंचर्स के लिए जिनके बिजनेस मॉडल अभी परिपक्व हो रहे हैं। AI डेवलपमेंट और डिप्लॉयमेंट की गति भी धीमी पड़ सकती है।
इसके अलावा, AI कंपनियों पर कॉपीराइट उल्लंघन और डेटा के कथित दुरुपयोग को लेकर मुकदमों की झड़ी लगी हुई है। कुछ मामलों में प्रति उल्लंघन $150,000 तक का हर्जाना मांगा जा रहा है। ये कानूनी पचड़े, बढ़ती लागतों के साथ मिलकर, इन कंपनियों के लिए एक बड़ा वित्तीय और प्रतिष्ठा संबंधी जोखिम पैदा कर रहे हैं।
आगे का रास्ता
भारत सरकार की यह पहल, जो वैश्विक ट्रेंड के अनुरूप है, डिजिटल कंटेंट इकोनॉमी के लिए एक बड़ा मोड़ साबित हो सकती है। अगर कंपनियां स्वेच्छा से नियमों का पालन नहीं करतीं, तो कानूनी ढांचा तैयार हो सकता है। इससे बिजनेस मॉडल का पुनर्मूल्यांकन करना पड़ सकता है, और प्लेटफॉर्म्स को क्रिएटर रॉयल्टी जैसे नए मोनेटाइजेशन की रणनीतियाँ अपनानी पड़ सकती हैं। वहीं, AI सेवाओं और विज्ञापन की कीमतों पर भी इसका असर दिख सकता है। यह इंडस्ट्री के लिए इनोवेशन और बराबरी के मूल्य वितरण के बीच संतुलन बनाने का एक महत्वपूर्ण क्षण है।