भारत का क्रिएटर इकोनॉमी: नॉन-मेट्रो शहरों से **66%** की बम्पर ग्रोथ!

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
भारत का क्रिएटर इकोनॉमी: नॉन-मेट्रो शहरों से **66%** की बम्पर ग्रोथ!

भारत का क्रिएटर बेस बढ़कर **41.2 लाख** हो गया है, जिसमें से दो-तिहाई क्रिएटर अब छोटे शहरों से आ रहे हैं। भले ही ऑडियंस एंगेजमेंट **7.2%** तक पहुंच गया है, लेकिन ज़्यादातर क्रिएटर्स को साल में एक से ज़्यादा पेड ब्रांड कैंपेन नहीं मिल पाते, जिससे कमाई और ग्रोथ के बीच एक बड़ी खाई बन गई है।

भारत में क्रिएटर इकोनॉमी का बदला मिजाज़

भारत में क्रिएटर इकोनॉमी एक बड़ा बदलाव देख रही है, जहां छोटे शहर और कस्बे कंटेंट बनाने के नए हब बन रहे हैं। इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस और हैशफेम (HashFame) के आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच सालों में क्रिएटर्स की संख्या चार गुना बढ़कर 41.2 लाख हो गई है। इस ग्रोथ का एक बड़ा हिस्सा बड़े शहरों के बाहर से आ रहा है, जहां अब देश के कुल क्रिएटर का 66% हिस्सा नॉन-मेट्रो इलाकों से है।

बढ़ती संख्या पर कमाई का सवाल?

भले ही क्रिएटर्स की संख्या तेजी से बढ़ रही है, लेकिन कंटेंट से एक स्थिर आय बनाना अभी भी एक चुनौती है। 2020 में जहां सिर्फ 38,000 क्रिएटर ब्रांड कैंपेन पर काम कर रहे थे, वहीं 2025 तक यह संख्या बढ़कर 4.08 लाख से ज़्यादा होने का अनुमान है। इसके बावजूद, आंकड़े बताते हैं कि ज़्यादातर क्रिएटर्स को साल भर में केवल एक पेड ब्रांड कैंपेन ही मिल पाता है। इस कमी के कारण कई क्रिएटर्स औसत सैलरी से भी कम कमा पाते हैं, जिससे कंटेंट क्रिएशन को फुल-टाइम प्रोफेशन बनाना मुश्किल हो जाता है। केवल माइक्रो-क्रिएटर कैटेगरी (10,000 से 1 लाख फॉलोअर्स वाले) के वे क्रिएटर्स, जिन्हें साल में कम से कम 5 कैंपेन मिलते हैं, वे ही पारंपरिक नौकरियों के बराबर कमाई के स्तर तक पहुंच पा रहे हैं।

मार्केटर्स का खर्च और एंगेजमेंट का हाल

मार्केटर्स को इस बिखरे हुए क्रिएटर बेस में वैल्यू दिख रही है। कुल फॉलोअर्स के मुकाबले लाइक्स और कमेंट्स से मापी जाने वाली ऑडियंस एंगेजमेंट 2020 में 1.8% से बढ़कर 2025 तक 7.2% हो गई है। एंगेजमेंट में यह बढ़ोतरी ब्रांड्स का भरोसा बढ़ा रही है। सालाना ब्रांड कैंपेन की संख्या तीन गुना होकर 42,000 तक पहुंच गई है, और इसी अवधि में प्रति कैंपेन औसत खर्च 3.6 गुना बढ़ गया है। यह दर्शाता है कि भले ही इंडस्ट्री अभी मॉनेटाइजेशन के शुरुआती दौर में है, लेकिन प्रति इंटरैक्शन वैल्यू बढ़ रही है।

रीजनल भाषाओं का बढ़ता दबदबा

हिंदी भाषा का कंटेंट अभी भी एक बड़ी ताकत बना हुआ है, जो क्रिएटर बेस का 42% हिस्सा है। हालांकि, तमिल, तेलुगु और मराठी जैसी क्षेत्रीय भाषाओं में कंटेंट बनाने वाले क्रिएटर्स की संख्या तेजी से बढ़ रही है और वे सामूहिक रूप से हिंदी क्रिएटर्स को पीछे छोड़ रहे हैं। उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्य फिलहाल कुल क्रिएटर्स के मामले में सबसे आगे हैं। वहीं, तमिलनाडु, कर्नाटक और गुजरात भी प्रमुख योगदानकर्ता के रूप में उभर रहे हैं, जहां उनकी आबादी के अनुपात से कहीं ज़्यादा भागीदारी देखी जा रही है। इस सेक्टर के विकास का अगला चरण संभवतः शॉर्ट-टर्म, सिंगल-कैंपेन मॉडल से हटकर सस्टेनेबल, लॉन्ग-टर्म ब्रांड पार्टनरशिप की ओर बढ़ेगा, जो इन क्षेत्रों के क्रिएटर्स के लिए लगातार कमाई सुनिश्चित कर सके।

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