भारत में स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स और टीवी नेटवर्क अब सितारों को सिर्फ होस्ट नहीं बना रहे, बल्कि उनकी पर्सनैलिटी के इर्द-गिर्द शो तैयार कर रहे हैं। इस नई स्ट्रैटेजी से न केवल यूनिक आईपी (IP) बन रही है, बल्कि विज्ञापन से कमाई के नए रास्ते भी खुल रहे हैं।
भारत के एंटरटेनमेंट नेटवर्क और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स अब बड़े सितारों को इस्तेमाल करने का तरीका पूरी तरह बदल रहे हैं। अब सितारों को सिर्फ शो होस्ट करने के लिए हायर नहीं किया जा रहा, बल्कि SonyLiv, Amazon Prime और Star Plus जैसे प्लेटफॉर्म्स अब ऐसे नॉन-फिक्शन शो बना रहे हैं जो किसी सेलिब्रिटी की पब्लिक इमेज से पूरी तरह मेल खाते हैं। इसका मुख्य मकसद कंटेंट की भीड़ में अपनी अलग पहचान बनाना है।
कैसे बन रही है 'Sticky' आईपी?
इस नई रणनीति में शो की थीम और स्टार की छवि को जोड़ा जा रहा है। उदाहरण के तौर पर, अजय देवगन की अनुशासित छवि का इस्तेमाल क्राइम शो के लिए हो रहा है, तो करण जौहर और अनिल कपूर जैसे सितारों की 'इंडस्ट्री इनसाइडर' इमेज का फायदा उन फॉर्मेट्स में उठाया जा रहा है जो उनकी असल लाइफ से प्रेरित दिखते हैं। प्लेटफॉर्म्स का मानना है कि इससे दर्शक लंबे समय तक प्लेटफॉर्म से जुड़े रहेंगे।
विज्ञापनों के लिए नया मॉडल
एडवरटाइजिंग सेक्टर के लिए यह एक किफायती मॉडल साबित हो रहा है। सीधे तौर पर सेलिब्रिटी एंडोर्समेंट काफी महंगे पड़ते हैं, लेकिन शो के दौरान ही प्रोडक्ट का इंटीग्रेशन (In-content Integration) करना ब्रांड्स के लिए ज्यादा प्रभावी और सस्ता सौदा है।
रेगुलेटरी और ऑपरेशनल रिस्क
यह राह चुनौतियों से खाली नहीं है। रेगुलेटर्स पर्सनैलिटी राइट्स, 'फिनफ्लुएंसर' गाइडलाइन्स और AI द्वारा बनाए गए डीपफेक को लेकर पहले से काफी सख्त हैं। अगर कोई सेलिब्रिटी विवादों में फंसता है, तो उससे जुड़ा पूरा कंटेंट और उस पर हुआ निवेश जोखिम में आ सकता है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि केवल स्टार पावर के दम पर दर्शकों को लंबे समय तक रोक पाना मुश्किल है; अगर कंटेंट की क्वालिटी कमजोर हुई, तो सेलिब्रिटी एसोसिएशन भी शो को बचा नहीं पाएगा। निवेशकों को यह देखना होगा कि कंपनियां कानूनी फ्रेमवर्क और सेलिब्रिटी डिपेंडेंसी के बीच कैसे संतुलन बनाती हैं।
