Publicis Media India और MMA India की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के **81%** मार्केटर्स विज्ञापनों के असर (Attention) से ज्यादा उसकी पहुंच (Reach) पर जोर दे रहे हैं। हालांकि, सही मापदंडों की कमी के कारण एड स्पेंड की एफिशिएंसी पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
विज्ञापन खर्च में कहां हो रही है गलती?
'Beyond Reach' नाम की इस रिपोर्ट ने भारतीय विज्ञापन जगत की बड़ी सच्चाई सामने रखी है। जहां 81% ब्रांड्स का मुख्य फोकस ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचना है, वहीं सिर्फ 17% ही इस बात पर ध्यान दे रहे हैं कि क्या कंज्यूमर वाकई उस कंटेंट को देख या समझ रहा है। इसका मतलब है कि कंपनियां बिना यह जाने पैसा खर्च कर रही हैं कि विज्ञापन का कोई असर हो रहा है या नहीं।
क्रिएटिविटी बनाम प्लेटफॉर्म की चुनौती
रिपोर्ट के मुताबिक, सिर्फ 14% मार्केटर्स ही अलग-अलग प्लेटफॉर्म के हिसाब से अपने विज्ञापनों में बदलाव करते हैं। बाकी कंपनियां एक ही तरह के एड सभी जगह चला रही हैं, जिससे ब्रांड्स का पैसा सही रिटर्न नहीं दे पा रहा है।
बदलाव की उम्मीद और बड़ी रुकावट
अच्छी खबर यह है कि इंडस्ट्री में सुधार की भूख है। करीब 86% मार्केटिंग लीडर्स का मानना है कि अगर उन्हें अटेंशन को मापने के लिए कोई स्टैंडर्ड टूल या बेंचमार्क मिल जाए, तो वे अपना बजट नए तरीके से एलोकेट करने को तैयार हैं। हालांकि, 92% प्रोफेशनल्स का मानना है कि इंडस्ट्री में अभी 'कॉमन बेंचमार्क' का न होना सबसे बड़ी रुकावट है।
अब सबकी नजर इस बात पर है कि कब तक कोई ऐसा स्टैंडर्ड फ्रेमवर्क विकसित होता है, जो ब्रांड मेमोरी और लॉन्ग-टर्म परचेज इंटेंट को सटीक रूप से माप सके।
