भारतीय गेमिंग इंडस्ट्री फिलहाल 'लो मोनेटाइजेशन' की समस्या से जूझ रही है। देश में **51 करोड़** से ज्यादा प्लेयर्स होने के बावजूद, प्रति यूजर सालाना कमाई महज **$2.04** है। अब कंपनियां विदेशी फंडिंग पर निर्भरता कम करने के लिए ओरिजिनल कंटेंट पर दांव लगा रही हैं।
भारत का गेमिंग सेक्टर एक बड़े विरोधाभास का सामना कर रहा है। एक तरफ हमारे पास 51 करोड़ गेमर्स की विशाल फौज है, तो दूसरी तरफ प्रति यूजर सालाना रेवेन्यू (ARPU) सिर्फ $2.04 तक सीमित है। यह आंकड़ा बताता है कि गेमिंग स्टूडियोज के लिए घरेलू बाजार से मुनाफे को टिकाऊ बनाना अभी भी एक कठिन परीक्षा बना हुआ है।
विदेशी फंडिंग पर भारी निर्भरता
'गेम डेवलपर एसोसिएशन ऑफ इंडिया' के आंकड़े बताते हैं कि देश के लगभग 75% स्टूडियो अपनी 90% से ज्यादा कमाई के लिए अंतरराष्ट्रीय स्रोतों पर निर्भर हैं। निवेशकों के लिए यह एक चिंता का विषय है, क्योंकि घरेलू बाजार में भुगतान करने की क्षमता कम होने से कंपनियां ग्लोबल मार्केट के उतार-चढ़ाव के प्रति बहुत ज्यादा संवेदनशील हो जाती हैं।
रेगुलेटरी और टैक्स का दबाव
ऑनलाइन गेमिंग पर 28% GST के नियम ने कारोबार की लागत को काफी बढ़ा दिया है। इस दबाव के बीच, Nazara Technologies जैसी दिग्गज लिस्टेड कंपनियां अब अपने पोर्टफोलियो को ई-स्पोर्ट्स (eSports) और एड-टेक (Ad-tech) जैसे क्षेत्रों में डायवर्सिफाई कर रही हैं ताकि बिजनेस की अस्थिरता को कम किया जा सके।
नया रास्ता: ओरिजिनल IP पर फोकस
इस चक्र से बाहर निकलने के लिए 82.7% स्टूडियो अब अपना खुद का 'इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी' (IP) बनाने पर ध्यान दे रहे हैं। बैटल रॉयल जैसे भीड़भाड़ वाले जॉनर से हटकर, डेवलपर्स अब अलग-अलग तरह के कंटेंट पर काम कर रहे हैं। हालांकि, एक क्रिएटिव कॉन्सेप्ट को कमर्शियल सफलता में बदलना अभी भी जोखिम भरा है। आने वाले समय में देखना होगा कि क्या ये कंपनियां मुफ्त खिलाड़ियों को पेड कस्टमर्स में बदलकर अपनी प्रॉफिटेबिलिटी को बरकरार रख पाती हैं या नहीं।
