भारतीय फिल्म प्रोडक्शन हाउस की कमाई पर तगड़ी मार पड़ी है। OTT प्लेटफार्म्स अब मिड-बजट फिल्मों के लिए भारी-भरकम गारंटीड डील देने से पीछे हट रहे हैं। इस बदलाव ने फिल्म इंडस्ट्री के सामने बड़े बजट गैप की समस्या खड़ी कर दी है।
डिजिटल सब्सिडी का दौर खत्म
एक लंबे समय तक भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के लिए OTT प्लेटफॉर्म एक फाइनेंशियल सुरक्षा कवच की तरह काम कर रहे थे। पोस्ट-पेंडमिक दौर में जब डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का चलन बढ़ा, तो उन्होंने कंटेंट के लिए मोटी रकम चुकाई। कई बार तो ये डील प्रोडक्शन कॉस्ट से भी ज्यादा होती थी, जिससे प्रोड्यूसर्स को थियेटर में फिल्म के चलने या न चलने का रिस्क नहीं रहता था। अब यह दौर पूरी तरह खत्म हो चुका है और प्लेटफॉर्म्स अब 'डेटा-ड्रिवेन' खर्च और प्रॉफिटेबिलिटी पर ध्यान दे रहे हैं।
बॉक्स ऑफिस पर कड़ी चुनौती
मिड-टियर प्रोजेक्ट्स के लिए अब सिनेमाघरों में टिके रहना और भी कठिन हो गया है। Daayra, Assi, और Dhadak 2 जैसी फिल्मों का प्रदर्शन यह साफ बताता है कि दर्शक अब केवल बड़े बजट और भव्य विजुअल स्पेक्टेकल वाली फिल्मों को ही थियेटर में देखना पसंद कर रहे हैं। वहीं, सोशल ड्रामा फिल्मों को थियेटर में दर्शक नहीं मिल रहे हैं, जिससे थियेटर मालिकों की कमाई पर भी असर पड़ रहा है।
भविष्य की राह: कॉस्ट कटिंग और पार्टनरशिप
अब प्रोड्यूसर्स के लिए रिस्क प्रोफाइल बहुत बढ़ गया है। प्री-रिलीज लाइसेंसिंग का सहारा न होने के कारण, इंडस्ट्री अब 'थियेट्रिकल-फर्स्ट' बिजनेस मॉडल की तरफ मुड़ रही है। सस्टेनेबिलिटी बनाए रखने के लिए अब प्रोडक्शन बजट को रिस्ट्रक्चर करना, रिस्क कम करने के लिए को-प्रोडक्शन पार्टनरशिप करना और मार्केटिंग पर बहुत ज्यादा फोकस करना जरूरी हो गया है। हालांकि, Hanuman Ansh और Awarapan 2 जैसी फिल्में यह साबित करती हैं कि अगर कंटेंट में दम हो और सही मार्केटिंग की जाए, तो मिड-बजट फिल्में आज भी सफल हो सकती हैं।
