भारतीय फिल्म इंडस्ट्री अब टियर-2 और टियर-3 शहरों को लुभाने के लिए लोकल माइथोलॉजी और फोकलोर की तरफ रुख कर रही है। हालांकि यह रणनीति बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट साबित हो रही है, लेकिन एक्सपर्ट्स क्वालिटी कंटेंट को लेकर सतर्क रहने की सलाह दे रहे हैं।
भारतीय मीडिया और एंटरटेनमेंट सेक्टर में एक बड़ा रणनीतिक बदलाव देखने को मिल रहा है। प्रोडक्शन हाउस अब मेट्रो-सेंट्रिक कहानियों से हटकर लोकल कल्चर, ऐतिहासिक घटनाओं और रीजनल लोककथाओं (Folklore) पर जोर दे रहे हैं। इसका मुख्य मकसद टियर-2 और टियर-3 शहरों में अपनी पैठ बनाना है, जो अब बॉक्स ऑफिस रेवेन्यू के मुख्य ड्राइवर बन गए हैं।
छोटे शहरों में बढ़ती सिनेमा की पहुंच
PVR INOX जैसी एग्जिबिशन चेन्स के लिए, लोकल परंपराओं से जुड़ी फिल्में कंटेंट का एक महत्वपूर्ण जरिया बन गई हैं। 'Kantara', 'Pushpa' और 'RRR' जैसी फिल्मों की सफलता ने यह साबित कर दिया है कि अगर कहानी का इमोशनल कोर मजबूत है, तो वह पूरे देश को जोड़ सकती है। यह स्ट्रैटेजी दोतरफा फायदा दे रही है—एक तरफ अपने होम मार्केट में वफादार ऑडियंस मिल रही है, तो दूसरी तरफ बड़े शहरों के दर्शक एक नई संस्कृति को 'डिस्कवर' कर रहे हैं।
आने वाले समय में Nitesh Tiwari की 'Ramayana' और Rishab Shetty की 'Jai Hanuman' जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स इसी दिशा में इंडस्ट्री के कमिटमेंट को दर्शाते हैं।
फॉर्मूला-बेस्ड कंटेंट का जोखिम
सफलता के बावजूद, फाइनेंशियर्स और इंडस्ट्री एनालिस्ट्स ने कुछ रिस्क भी गिनाए हैं। अगर मार्केट में केवल ऐतिहासिक या पौराणिक ड्रामा की बाढ़ आ जाएगी, तो क्षेत्रीय पहचान के 'कमोडिटाइजेशन' का खतरा बढ़ जाएगा। यदि स्टूडियोज कहानी की क्वालिटी के बजाय सिर्फ वॉल्यूम पर फोकस करेंगे, तो दर्शकों में 'ऑडियंस फटीग' (Audience Fatigue) पैदा हो सकता है।
इस सेक्टर की सस्टेनेबिलिटी इस बात पर निर्भर करेगी कि मेकर्स स्पेक्टेकल (Spectacle) और ऑथेंटिक स्टोरीटेलिंग के बीच कैसा तालमेल बिठाते हैं। निवेशकों के लिए यह देखना जरूरी होगा कि क्या प्रोडक्शन हाउस इस बढ़ती पाइपलाइन में क्वालिटी बनाए रख पाते हैं या यह सिर्फ एक अस्थायी दौर बनकर रह जाता है।
