त्योहारी सीजन में भारतीय कंपनियां अपना मार्केटिंग बजट बदल रही हैं। बड़े सेलिब्रिटीज के बजाय अब टियर-2 और टियर-3 शहरों में सेल्स बढ़ाने के लिए माइक्रो-इन्फ्लुएंसर्स पर दांव लगाया जा रहा है, ताकि महंगाई के दौर में ग्राहकों का भरोसा जीता जा सके।
कन्वर्जन पर कंपनियों का फोकस\n\nफेस्टिव सीजन के दौरान मार्केटिंग का ट्रेंड तेजी से बदल रहा है। अब ब्रांड्स का फोकस ब्रांड अवेयरनेस के बजाय 'कन्वर्जन' और 'खरीद इरादे' (Purchase Intent) पर शिफ्ट हो गया है। टियर-2 और टियर-3 शहरों में स्थानीय भाषा और वहां के लोगों का इन्फ्लुएंसर्स पर भरोसा, नेशनल सेलिब्रिटीज के मुकाबले ज्यादा असरदार साबित हो रहा है। यही वजह है कि भले ही इन्फ्लुएंसर्स के फॉलोअर्स कम हैं, लेकिन ब्रांड्स उन्हें अधिक फीस देने को तैयार हैं क्योंकि वे सेल्स को सीधे ट्रांजेक्शन में बदलने का दम रखते हैं।\n\n### ऑपरेशनल चुनौतियां और डेडलाइन का दबाव\n\nयह विकेंद्रीकृत (Decentralized) मॉडल कंपनियों के लिए नई मुसीबतें भी लेकर आया है। पहले जहां कुछ बड़े सेलिब्रिटीज के साथ काम करना आसान था, वहीं अब सैकड़ों छोटे इन्फ्लुएंसर्स को एक साथ मैनेज करना एक बड़ी लॉजिस्टिकल चुनौती है। कंपनियों को 48 घंटे जैसी कम समय सीमा में कंटेंट तैयार करवाना पड़ रहा है, जिससे क्रिएटिव क्वालिटी पर असर पड़ने का रिस्क बना रहता है।\n\n### लागत कम करने के लिए 'बंडलिंग' की रणनीति\n\nमहंगाई के दबाव और मार्केटिंग खर्च को नियंत्रित करने के लिए कंपनियां अब 'क्रॉस-ब्रांड कोलैबोरेशन' का सहारा ले रही हैं। Zepto, Blue Heaven और Foxtale जैसे ब्रांड्स एक ही इन्फ्लुएंसर्स कैंपेन में कई प्रोडक्ट्स को बंडल कर रहे हैं। इस स्ट्रैटेजी से न केवल कस्टमर एक्विजिशन की लागत कम होती है, बल्कि कंपनियां अपने प्रॉफिट मार्जिन को सुरक्षित रखने में भी सफल हो रही हैं। इन्वेस्टर्स के लिए अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या कंपनियां इन जटिल और बिखरे हुए नेटवर्क को कुशलतापूर्वक मैनेज कर पाएंगी या नहीं।