जनरेटिव AI के बढ़ते प्रभाव के बीच भारतीय कलाकार अब अपनी कला की प्रामाणिकता साबित करने के लिए सख्त डॉक्यूमेंटेशन का सहारा ले रहे हैं। कलेक्टर्स और गैलरीज अब आर्टवर्क के मानवीय होने का पुख्ता सबूत मांग रहे हैं, जिससे ऑथेंटिकेशन टूल्स का एक नया मार्केट तेजी से उभर रहा है।
जैसे-जैसे जेनरेटिव AI की पहुंच बढ़ रही है, भारतीय आर्ट और कमर्शियल क्रिएटिव सेक्टर में बड़ा बदलाव आ रहा है। अपनी कला की वैल्यू और विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए कलाकार अब 'प्रोग्रेस शॉट्स', 'टाइम-लैप्स वीडियो' और डिजिटल रिकॉर्ड्स को एक बिजनेस एसेट की तरह सुरक्षित रख रहे हैं। यह कदम इसलिए उठाया जा रहा है क्योंकि कलेक्टर्स अब उन आर्टवर्क्स को प्राथमिकता दे रहे हैं जिनकी मानवीय उत्पत्ति का ठोस प्रमाण उपलब्ध हो।
कमर्शियल सेक्टर में बदलता समीकरण
आर्ट के बाजार में एक तरफ तो प्रमाणिकता की होड़ है, वहीं दूसरी ओर कमर्शियल और विज्ञापन जगत में AI का बोलबाला है। 'Vinc' जैसी प्रोडक्शन फर्में AI का इस्तेमाल करके काम को तेजी से और कम लागत में निपटा रही हैं। इस वजह से उन पारंपरिक कलाकारों पर दबाव बढ़ा है जो AI का इस्तेमाल नहीं करते, क्योंकि क्लाइंट्स अब सस्ते और तेज विकल्पों को चुन रहे हैं।
ऑथेंटिकेशन मार्केट की नई संभावनाएं
आर्ट और टेक्नोलॉजी के इस मेल से डिजिटल ऑथेंटिकेशन का एक नया बाजार तैयार हो रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, AI-आधारित आर्ट ऑथेंटिकेशन सेक्टर जो 2025 में करीब $2.9 मिलियन था, वह 2030 तक बढ़कर $7.09 मिलियन तक पहुंच सकता है। निवेशकों के लिए यह एक उभरता हुआ टेक्नोलॉजी सेगमेंट है जो सिंथेटिक फॉरgeries (नकली कला) के खतरे से निपटने का काम करेगा।
कानूनी चुनौतियां और रिस्क
इस पूरे मामले में अभी भी कानूनी अस्पष्टता बनी हुई है। 'Copyright Act of 1957' में AI द्वारा बनाई गई कंटेंट के लिए स्पष्ट प्रावधान नहीं हैं। हालांकि, 'Advertising Standards Council of India' (ASCI) ने सिंथेटिक मीडिया के लिए लेबलिंग अनिवार्य कर दी है, लेकिन इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी का मुद्दा अभी भी विवादों में है। भविष्य में आने वाले रेगुलेटरी अपडेट्स ही यह तय करेंगे कि इस ऑटोमेटेड मार्केट में 'ह्यूमन-मेड' आर्ट का प्रीमियम स्टेटस कितना सुरक्षित रहेगा।
