सरकार ने टीवी चैनलों पर प्रति घंटे विज्ञापन दिखाने की 12 मिनट की समय सीमा को हटा दिया है। यह नियम 21 अगस्त 2026 से लागू होगा। इससे ब्रॉडकास्टर्स को अधिक विज्ञापन स्पेस मिलेगा, लेकिन डिजिटल मीडिया से कड़ी प्रतिस्पर्धा और दर्शकों के नाराज होने का खतरा भी है।
विज्ञापन की नई राह
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने टीवी चैनलों पर प्रति घंटे विज्ञापन की अवधि को लेकर लगाई गई पुरानी 12 मिनट की सीमा को खत्म कर दिया है। केबल टेलीविज़न नेटवर्क्स (संशोधन) रूल्स, 2026 के तहत यह बदलाव 21 अगस्त 2026 से प्रभावी हो गया है।
यह कैप मूल रूप से 2006 में लगाई गई थी, जब भारतीय टीवी इंडस्ट्री काफी छोटी थी और केवल 62 चैनल ही हुआ करते थे। आज 900 से ज़्यादा चैनल हैं और DTH व केबल जैसे डिजिटल माध्यमों का बोलबाला है। सरकार का कहना है कि इस बदलाव का मकसद पारंपरिक टीवी ब्रॉडकास्टर्स और डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के बीच एक समान अवसर तैयार करना है, जिन पर ऐसी कोई समय सीमा कभी नहीं थी।
विज्ञापन स्पेस पर असर
इस नियम के हटने से टीवी कंपनियों के लिए विज्ञापन बेचने के लिए उपलब्ध 'इन्वेंट्री' (समय) बढ़ जाएगी। सैद्धांतिक रूप से, ज़्यादा एयरटाइम का मतलब ज़्यादा रेवेन्यू हो सकता है। लेकिन, निवेशकों के लिए इसका सीधा और बड़ा फायदा शायद तुरंत न दिखे।
मार्केट एनालिस्ट्स का मानना है कि रेवेन्यू में बढ़ोतरी मामूली, करीब 1% से 3% तक हो सकती है। ब्रॉडकास्टर्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती डिजिटल मीडिया से बढ़ता दबाव और दर्शकों की बदलती पसंद है। अगर सभी चैनल एक साथ विज्ञापन का समय बढ़ा देते हैं, तो बाज़ार में विज्ञापन स्लॉट की सप्लाई बढ़ जाएगी। अर्थशास्त्र के सामान्य नियम के अनुसार, जब मांग स्थिर रहे और सप्लाई बढ़ जाए, तो विज्ञापन दरों पर दबाव आ सकता है।
दर्शकों की नाराज़गी का खतरा?
रेवेन्यू और कीमतों के अलावा, दर्शकों की थकान (viewer fatigue) का एक बड़ा खतरा भी है। टीवी चैनल पहले से ही दर्शकों को बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, क्योंकि लोग तेज़ी से स्ट्रीमिंग सेवाओं और OTT ऐप्स की ओर जा रहे हैं। यदि ब्रॉडकास्टर्स अतिरिक्त समय में ज़्यादा विज्ञापन दिखाते हैं, तो वे दर्शकों को नाराज़ कर सकते हैं। ज़्यादा विज्ञापनों से भरा अनुभव दर्शकों को लीनियर टेलीविज़न से दूर कर सकता है, जिससे लंबी अवधि में व्यूअरशिप नंबर्स को नुकसान पहुँच सकता है।
निवेशकों और बाज़ार पर नज़र रखने वालों के लिए, अगला कदम अहम होगा। यह देखना ज़रूरी होगा कि प्रमुख ब्रॉडकास्टर्स की तिमाही नतीजों में विज्ञापन की मात्रा बढ़ती है या नहीं, और क्या इससे रेवेन्यू बढ़ता है या प्रति स्लॉट कीमत गिरती है। भविष्य की अर्निंग कॉल्स में मैनेजमेंट की ओर से इस नई फ्लेक्सिबिलिटी को लेकर उनकी रणनीति भी यह बताएगी कि इंडस्ट्री शॉर्ट-टर्म फायदे और दर्शक बनाए रखने की ज़रूरत के बीच कैसे संतुलन बनाएगी।
