भारत में ऑनलाइन स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स (OTT) के लिए नई राहें खुलने वाली हैं। सरकार ने दिव्यांगजन अधिकार नियम, 2026 में ड्राफ्ट संशोधन पेश किए हैं, जिनके तहत OTT प्लेटफॉर्म्स को अब ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS) की एक्सेसिबिलिटी यानी पहुंच संबंधी आवश्यकताओं का पालन करना होगा। इस नए नियम के लागू होने से हजारों घंटे के मौजूदा कंटेंट को नए मानकों के अनुसार अपडेट करने में कंपनियों को भारी लागत और समय लग सकता है।
क्या हैं नए नियम?
दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग (DEPwD) ने 'दिव्यांगजन अधिकार नियम, 2026' में कुछ अहम बदलावों का प्रस्ताव दिया है। अगर ये ड्राफ्ट नियम लागू होते हैं, तो सभी ऑनलाइन स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स को अपने डिजिटल कंटेंट के लिए BIS की सख्त एक्सेसिबिलिटी गाइडलाइंस का पालन करना अनिवार्य होगा।
सबसे बड़ी चुनौती: पुराने कंटेंट को अपडेट करना
इस नए नियम की सबसे बड़ी मार इंडस्ट्री पर इसलिए पड़ने वाली है क्योंकि उन्हें अपने प्लेटफॉर्म पर मौजूद हजारों घंटे के पुराने कंटेंट, जैसे फिल्में और शो, को नए मानकों के हिसाब से बदलना होगा। ऑडियो डिस्क्रिप्शन, विशेष सबटाइटल या साइन लैंग्वेज इंटरप्रिटेशन जैसी सुविधाओं को जोड़ने के लिए काफी समय, तकनीकी प्रयास और पैसों की जरूरत होगी।
रेगुलेटरी जंजाल और सख्त गाइडलाइंस
पहले से ही IT रूल्स और सूचना प्रसारण मंत्रालय (MIB) की गाइडलाइंस के तहत काम कर रहे OTT प्लेटफॉर्म्स के लिए यह एक और सिरदर्द साबित हो सकता है। सरकार ने साफ कर दिया है कि अगर अलग-अलग नियमों में कोई टकराव होता है, तो सबसे सख्त नियम को ही मान्य माना जाएगा। इससे प्लेटफॉर्म्स के लिए कई तरह के अनुपालन (Compliance) की आवश्यकताओं को संतुलित करना मुश्किल हो सकता है।
समय-सीमा और लागत का गणित
नए नियमों के लागू होने की समय-सीमा भी काफी चुस्त है। ₹500 करोड़ या उससे अधिक का सालाना टर्नओवर रखने वाली बड़ी कंपनियों को एक साल के भीतर कुछ गैर-परक्राम्य (Non-negotiable) एक्सेसिबिलिटी प्रावधानों का पालन करना होगा। छोटी कंपनियों को इसके लिए 18 महीने मिलेंगे। सभी मानकों का पूरा अनुपालन दो साल के भीतर जरूरी होगा। इसका मतलब है कि कंपनियों को कंटेंट प्रोड्यूसर्स के साथ पुराने लाइसेंसिंग एग्रीमेंट्स को भी देखना पड़ सकता है, जो कानूनी और आर्थिक रूप से जटिल साबित हो सकता है।
निवेशकों की नजर
अब यह देखना अहम होगा कि सरकार इन नियमों को अंतिम रूप देने के बाद क्या बदलाव लाती है। निवेशकों और हितधारकों की नजरें इस बात पर टिकी रहेंगी कि प्लेटफॉर्म्स कितनी जल्दी अपनी तकनीकी अवसंरचना (Technical Infrastructure) को इन नई समय-सीमाओं के अनुसार ढाल पाते हैं और इसका उनके ऑपरेशनल खर्चों पर कितना असर पड़ता है। हालांकि, आर्काइव किए गए कंटेंट, जिसका सक्रिय रूप से इस्तेमाल नहीं होता, को लेकर कुछ छूट का प्रस्ताव भी दिया गया है, जिससे बड़ी लाइब्रेरी वाली कंपनियों को थोड़ी राहत मिल सकती है।
