भारत ने अपनी मीडिया रणनीति में बड़ा बदलाव किया है, जिसका मुख्य मकसद डिजिटल इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी (IP) पर घरेलू मालिकाना हक बढ़ाना है। भारत का मीडिया और एंटरटेनमेंट मार्केट अब **₹2.78 लाख करोड़** के आंकड़े पर पहुंच गया है और नई सरकारी नीतियों के जरिए विदेशी प्लेटफॉर्म्स पर निर्भरता कम करने की तैयारी है।
वैल्यू चेन पर भारत का फोकस
भारत सरकार अब देश को सिर्फ एक कंज्यूमर मार्केट से बदलकर एक क्रिएटर और एक्सपोर्टर के तौर पर स्थापित करना चाहती है। आज भले ही भारत में इंटरनेट का जाल बिछा हो और डेटा सस्ता हो, लेकिन असल कमाई का एक बड़ा हिस्सा विदेशी कंपनियों की जेब में जा रहा है। सरकार की नई कोशिशों का मकसद कहानियों, किरदारों और फ्रेंचाइजी से मिलने वाली कमाई को भारत की सीमाओं के भीतर रखना है।
मीडिया इकोनॉमी की नई तस्वीर
₹2.78 लाख करोड़ के विशाल मीडिया और एंटरटेनमेंट सेक्टर में अब एक बड़ा शिफ्ट देखने को मिल रहा है। 'World Audio Visual & Entertainment Summit' (WAVES) और AVGC-XR (एनिमेशन, विजुअल इफेक्ट्स, गेमिंग, कॉमिक्स और एक्सटेंडेड रियलिटी) सेक्टर को मिल रहा सरकारी सपोर्ट इसका प्रमाण है। ये कदम इसलिए उठाए जा रहे हैं ताकि लोकल प्रोडक्शन हाउस सर्विस कॉन्ट्रैक्ट्स पर निर्भर रहने के बजाय खुद की IP बना सकें और लंबे समय तक मुनाफा कमा सकें।
इंफ्रास्ट्रक्चर और पॉलिसी रिफॉर्म्स
2026 यूनियन बजट में डेटा लोकलाइजेशन और स्वदेशी इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट को प्राथमिकता दी गई है। सरकारी नीतियों का जोर इस बात पर है कि डेटा और कंटेंट का मैनेजमेंट भारत के क्लाउड और स्टोरेज सिस्टम के जरिए हो। इससे न केवल विदेशी प्लेटफॉर्म्स की ओर हो रही कमाई की लीकेज रुकेगी, बल्कि गेमिंग और टेक्नोलॉजी सेक्टर में आरएंडडी (R&D) के लिए भारी सरकारी फंड मिलने की उम्मीद भी बढ़ी है।
निवेशकों के लिए चेतावनी और अवसर
निवेशकों को यह देखना होगा कि क्या भारतीय कंपनियां लो-मार्जिन सर्विस वर्क से हटकर हाई-मार्जिन IP ओनरशिप की ओर बढ़ पा रही हैं। हालांकि, आरएंडडी पर खर्च की कमी और ग्लोबल क्लाउड दिग्गजों के सामने टिक पाना अभी भी एक बड़ी चुनौती है। निवेशकों को आने वाले समय में कंपनियों के कैश फ्लो और उनके द्वारा बनाई गई नई डिजिटल संपत्ति पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए।
