भारत सरकार ने 35 साल बाद फिल्म सर्टिफिकेशन गाइडलाइन्स में बड़ा बदलाव किया है। अब ड्रग्स को लेकर डिस्क्लेमर और फिल्मों के लिए नए एज-बेस्ड 'U/A' मार्कर्स अनिवार्य होंगे, जिसका सीधा असर मीडिया कंपनियों के कंप्लायंस और मार्केटिंग खर्च पर पड़ेगा।
सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने भारत की फिल्म सर्टिफिकेशन प्रक्रिया में व्यापक बदलाव किए हैं, जो पिछले 35 वर्षों में सबसे बड़ा बदलाव माना जा रहा है। ये नए नियम 'सिनेमैटोग्राफ एक्ट' के तहत लाए गए हैं, जिनका उद्देश्य सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) के कामकाज को आधुनिक बनाना है।
प्रोडक्शन हाउस पर नया बोझ
अब किसी भी फिल्म में नशीले पदार्थों या ड्रग्स के इस्तेमाल वाले सीन होने पर अनिवार्य डिस्क्लेमर दिखाना होगा। यह डिस्क्लेमर फिल्म के अलावा इसके ट्रेलर, पोस्टर और डिजिटल मार्केटिंग के हर हिस्से पर दिखाना जरूरी होगा। इसका सीधा मतलब है कि अब स्टूडियो और प्रोडक्शन हाउस को अपने मार्केटिंग बजट और एडमिनिस्ट्रेटिव काम को नए सिरे से तैयार करना होगा।
बदल गया एज-रेटिंग का सिस्टम
अब फिल्मों को केवल सामान्य 'U/A' रेटिंग नहीं दी जाएगी, बल्कि इसे और बारीकी से बांटा गया है। इसमें U/A 7+, U/A 13+, और U/A 16+ जैसे मार्कर्स शामिल किए गए हैं। फिल्म बनाने वाली कंपनियों को अब अपनी हर फिल्म और प्रमोशन में इन स्पष्ट एज-मार्कर को दिखाना होगा।
निवेशकों के लिए जोखिम
PVR Inox जैसे थिएटर चेन्स और तमाम बड़े प्रोडक्शन हाउसेस के लिए ये नियम नए कंप्लायंस चैलेंज लेकर आए हैं। जानकारों का मानना है कि इन सख्त नियमों के कारण फिल्मों की रिलीज में देरी हो सकती है, क्योंकि हिंसा, क्राइम और नशीले पदार्थों के चित्रण को लेकर बोर्ड की सख्ती अब पहले से कहीं ज्यादा होगी। निवेशकों की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि मीडिया कंपनियां इन नियमों के साथ अपनी कंटेंट स्ट्रेटजी को कितनी जल्दी और कितनी कुशलता से बदलती हैं, क्योंकि इसका असर सीधा रिलीज शेड्यूल और ऑपरेशनल लागत पर पड़ेगा।
