भारत सरकार IT Rules 2021 में बदलाव की तैयारी कर रही है। अब OTT प्लेटफॉर्म्स पर फिल्म रिलीज़ होने से पहले सर्टिफिकेशन (Certification) कराना अनिवार्य हो सकता है। ZEE5 पर एक फिल्म को राष्ट्रीय सुरक्षा के चलते हटाने के सरकारी आदेश के बाद यह कदम उठाया जा रहा है। इस बदलाव से स्ट्रीमिंग सेवाओं पर रेगुलेटरी (Regulatory) पकड़ मज़बूत हो सकती है और भविष्य में रिलीज़ होने वाले कंटेंट पर असर पड़ सकता है।
OTT कंटेंट पर लगेगी सर्टिफिकेशन की मुहर?
सूचना और प्रसारण मंत्रालय (Ministry of Information and Broadcasting) सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 में संशोधन पर गंभीरता से विचार कर रहा है। इस प्रस्ताव का मकसद ओवर-द-टॉप (OTT) स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स पर रिलीज़ होने वाली फिल्मों के लिए एक अनिवार्य प्री-रिलीज़ सर्टिफिकेशन (Pre-release Certification) प्रक्रिया लागू करना है। यह व्यवस्था वैसी ही होगी जैसी वर्तमान में सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) के ज़रिए सिनेमाघरों में रिलीज़ होने वाली फिल्मों के लिए लागू है।
ZEE5 फिल्म विवाद के बाद हरकत में सरकार
यह नीतिगत बदलाव ZEE5 के हालिया मामले के बाद आया है। प्लेटफॉर्म ने कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन पर आधारित एक फिल्म स्ट्रीम की थी। सरकारी आदेश के बाद, रिलीज़ के महज़ दो दिन बाद, 5 जुलाई को इस कंटेंट को प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया। अधिकारियों का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और भारत की संप्रभुता के लिए संभावित खतरों को देखते हुए यह निर्णय लिया गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस फिल्म को CBFC से कोई मंज़ूरी नहीं मिली थी और डिजिटल डेब्यू से पहले इसमें कुछ बदलावों के सुझाव दिए गए थे।
स्ट्रीमिंग सेवाओं पर रेगुलेटरी असर
फिलहाल, OTT प्लेटफॉर्म्स एक सेल्फ-रेगुलेटरी (Self-regulatory) ढांचे के तहत काम करते हैं, जिससे उन्हें पारंपरिक मीडिया की तुलना में कंटेंट रिलीज़ करने में ज़्यादा छूट मिलती है। अगर प्रस्तावित बदलाव लागू होते हैं, तो फिल्म रिलीज़ के मामले में प्लेटफॉर्म्स की यह स्वायत्तता खत्म हो जाएगी। इससे कंप्लायंस कॉस्ट (Compliance Cost) बढ़ सकती है और दर्शकों तक कंटेंट पहुंचने में ज़्यादा समय लग सकता है। सरकारी नियुक्त समिति ने फिल्म को राष्ट्रीय अखंडता के उल्लंघन का हवाला देते हुए सार्वजनिक पहुंच से ब्लॉक रखने की सिफारिश की है। हालांकि, सरकार के पास पहले से ही IT Act की धारा 69A के तहत ऑनलाइन कंटेंट को ब्लॉक करने की शक्तियां हैं, जो सार्वजनिक व्यवस्था या संप्रभुता के लिए खतरा पैदा करते हैं, लेकिन सर्टिफिकेशन को अनिवार्य बनाना रेगुलेटरी नियंत्रण का एक महत्वपूर्ण विस्तार होगा।
निवेशकों के लिए क्या है मायने?
मीडिया और मनोरंजन क्षेत्र के निवेशकों और हितधारकों के लिए, यह घटनाक्रम डिजिटल मीडिया पर बढ़ते निरीक्षण के रुझान को दर्शाता है। भले ही स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स मीडिया कंपनियों के विकास के मुख्य चालक रहे हैं, लेकिन कंटेंट में देरी, कानूनी चुनौतियां और महंगे री-एडिट्स की संभावना भविष्य की मुनाफे को प्रभावित कर सकती है। परिचालन पर इसका असर नियमों की अंतिम संरचना पर निर्भर करेगा, खासकर कंटेंट सर्टिफिकेशन के दायरे और अनुमोदन प्रक्रिया की समय-सीमा को कैसे परिभाषित किया जाता है।
निवेशक सूचना और प्रसारण मंत्रालय से इन संशोधनों की समय-सीमा के संबंध में आगे की सूचनाओं पर नज़र रख सकते हैं। अन्य महत्वपूर्ण कारक प्लेटफॉर्म का कंटेंट अधिग्रहण के प्रति भविष्य का दृष्टिकोण और रेगुलेटरी कंप्लायंस के प्रबंधन की उसकी रणनीति, साथ ही भारत में संचालित होने वाली अन्य प्रमुख स्ट्रीमिंग सेवाओं से व्यापक उद्योग प्रतिक्रिया को ट्रैक करना होगा।
