क्रिकेट अब नेशनल बोर्ड्स के दायरे से निकलकर प्राइवेट फ्रेंचाइजी मॉडल में बदल रहा है। भारत के बाहर भी टीम विस्तार के साथ ही यह खेल एक बड़े बिजनेस का रूप ले चुका है, जिससे नेशनल बोर्ड्स पर खुद को प्राइवेटाइज करने का दबाव बढ़ रहा है।
क्रिकेट की दुनिया में एक बड़ा आर्थिक बदलाव देखने को मिल रहा है। दशकों तक यह खेल सरकारी या पब्लिक बॉडीज द्वारा मैनेज किया जाता था, लेकिन अब Indian Premier League (IPL) की बेतहाशा सफलता ने पूरे बिजनेस मॉडल को बदल दिया है। IPL ने टीम वैल्यूएशन और मीडिया राइट्स के जो मानक सेट किए हैं, वहां तक पहुंचना बाकी देशों के क्रिकेट बोर्ड्स के लिए एक चुनौती बन गया है।
IPL मालिकों का ग्लोबल विस्तार
अब IPL के फ्रेंचाइजी मालिक केवल भारतीय बाजार तक सीमित नहीं हैं। इन्होंने साउथ अफ्रीका, UAE, USA और UK जैसी जगहों पर भी अपनी टीमें खरीद ली हैं, जिससे साल के 365 दिन क्रिकेट का एक ग्लोबल कैलेंडर तैयार हो गया है। एक साथ कई देशों में टीमें होने से ये मालिक टैलेंट मैनेजमेंट और मार्केटिंग में जो बढ़त ले रहे हैं, उसे ट्रेडिशनल बोर्ड्स के लिए कॉपी करना मुश्किल हो रहा है।
प्राइवेटाइजेशन का दबाव
बढ़ती सैलरी और प्राइवेट लीग्स के मुकाबले में टिके रहने के लिए ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड जैसे बड़े क्रिकेट बोर्ड्स भी अब अपने एसेट्स को प्राइवेटाइज करने पर विचार कर रहे हैं। हालांकि, ऑस्ट्रेलिया की Big Bash League जैसे मामलों में प्राइवेट इन्वेस्टमेंट के लिए बोर्ड्स को अंदरूनी विरोध का सामना करना पड़ा है।
रेगुलेटरी और गवर्नेंस का रिस्क
जैसे-जैसे क्रिकेट एक फ्रेंचाइजी-संचालित अर्थव्यवस्था बन रहा है, कानूनी विवाद भी बढ़ रहे हैं। Competition Commission of India (CCI) पहले ही बोर्ड की मार्केट पोजिशन पर सवाल उठा चुका है। इसके अलावा, प्राइवेट लीग्स के चक्कर में इंटरनेशनल टेस्ट क्रिकेट की आर्थिक स्थिरता और नए टैलेंट पाइपलाइन पर भी खतरा मंडरा रहा है।
निवेशकों के लिए जरूरी बातें
निवेशकों को अब बोर्ड्स और प्राइवेट कैपिटल के बीच बढ़ते विवादों पर नजर रखनी चाहिए। भविष्य में एंटी-ट्रस्ट फाइलिंग, प्लेयर्स के आने-जाने (Mobility) पर नियम और एक ओनर द्वारा रखी जा सकने वाली टीमों पर कैप जैसे बदलाव इस खेल के भविष्य के वैल्यूएशन को तय करेंगे।
