भारत में Gen Z की शॉपिंग का तरीका बदल रहा है। GWI-Snapchat की नई स्टडी बताती है कि **76%** युवा खरीदारी का भरोसा दोस्तों और परिवार से पाते हैं, न कि किसी इन्फ्लुएंसर से। इस बदलाव के कारण कंपनियों को शॉर्ट-टर्म फेस्टिव कैंपेन से हटकर, लगातार ट्रस्ट बनाने वाली स्ट्रैटेजी पर ध्यान देना होगा।
Gen Z का बदला शॉपिंग अंदाज़
भारत में त्योहारी सीजन के दौरान होने वाली शॉपिंग, जो अब तक शॉर्ट-टर्म और हाई-वॉल्यूम मार्केटिंग के लिए जानी जाती थी, Gen Z के कारण एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। GWI और Snapchat की 12 अगस्त, 2026 को जारी हुई 'Diwali & the Festive Season in India' रिपोर्ट से पता चलता है कि भले ही क्रिएटर्स से मिले कंटेंट से प्रोडक्ट की शुरुआती जानकारी मिल जाती हो, लेकिन अब खरीदारी के फैसले लेने में वे सबसे बड़े फैक्टर नहीं रह गए हैं।
यह स्टडी उन ब्रांड्स के लिए एक बड़ा इशारा है जो अभी भी बड़े पैमाने पर रीच या इन्फ्लुएंसर-बेस्ड अवेयरनेस पर ज़ोर दे रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 70% Gen Z ग्राहक प्रोडक्ट खोजने के लिए क्रिएटर्स का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से 76% यह मानते हैं कि सीधे दोस्तों और परिवार से मिलने वाली सलाह ही उन्हें खरीदारी का पक्का भरोसा दिलाती है। निवेशकों और कंपनी मैनेजमेंट के लिए इसका मतलब है कि मार्केटिंग पर रिटर्न (ROI) अब केवल सेलिब्रिटी या इन्फ्लुएंसर की पॉपुलैरिटी पर नहीं, बल्कि ब्रांड की ओर से साथियों के बीच भरोसा कायम करने की क्षमता पर ज़्यादा निर्भर करेगा।
मार्केटिंग स्ट्रैटेजी में कैसा हो बदलाव?
FMCG, कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स और ई-कॉमर्स सेक्टर की कंपनियों के लिए यह रिसर्च बताती है कि फेस्टिव बजट को कैसे मैनेज किया जाना चाहिए। पहले फेस्टिव एडवरटाइजिंग स्ट्रैटेजी का फोकस दिवाली जैसे बड़े त्योहारों के आसपास एक बड़ा मार्केटिंग 'वेव' बनाने पर होता था। लेकिन, इस स्टडी के मुताबिक, Gen Z की परचेज़ जर्नी अब लंबी हो गई है। करीब 40% Gen Z अपनी फेस्टिव शॉपिंग की प्लानिंग कम से कम एक महीना पहले शुरू कर देते हैं, और उनका शॉपिंग पैटर्न सोची-समझी प्लानिंग और अचानक लिए गए फैसलों का मिला-जुला रूप होता है। जो ब्रांड्स इस लंबे फेस्टिव पीरियड में लगातार एंगेजमेंट बनाए नहीं रख पाते, वे मार्केट से पिछड़ सकते हैं, क्योंकि शॉपिंग का ट्रेंड 'बिग शॉपिंग वीकेंड' मॉडल से आगे बढ़ रहा है।
विजिबिलिटी से ज़्यादा 'ट्रस्ट' क्यों ज़रूरी?
ऐसे एडवरटाइजिंग प्लेटफॉर्म्स जो बातचीत और डिस्कशन को बढ़ावा देते हैं, वे अब बढ़त बना रहे हैं। डेटा के मुताबिक, भारत में रोज़ाना Snapchat इस्तेमाल करने वाले 75% लोग प्लेटफॉर्म पर संभावित खरीदारी पर चर्चा करते हैं, और 67% का कहना है कि इस इंटरैक्शन से उनका भरोसा बढ़ता है। यह एड स्पेंड के आवंटन में एक बड़ा अंतर पैदा करता है: जो प्लेटफॉर्म्स प्राइवेट, भरोसेमंद बातचीत को संभव बनाते हैं, वे सिर्फ पैसिव कंटेंट देखने वाले प्लेटफॉर्म्स की तुलना में बेहतर कन्वर्जन रेट दे सकते हैं।
ब्रांड्स के लिए रिस्क साफ है। अगर कोई एडवरटाइजिंग कैंपेन केवल 'विजिबिलिटी' पर फोकस करता है और ऑथेंटिक, ऑर्गेनिक एडवोकेसी बनाने की स्ट्रैटेजी नहीं रखता, तो यह एड-स्पेंड की बर्बादी साबित हो सकता है। जैसे-जैसे Gen Z अपनी फाइनल परचेज़ की पुष्टि के लिए प्राइवेट चैनल का ज़्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं, जो ब्रांड्स कम्युनिटी या पीयर-शेयरिंग इंसेंटिव्स को बढ़ावा नहीं देते, उन्हें बिक्री में कन्वर्ट करने में मुश्किल हो सकती है।
उपभोक्ता-उन्मुख कंपनियों पर नज़र रखने वाले निवेशकों को एड स्पेंड में उन प्लेटफॉर्म्स की ओर शिफ्टिंग पर ध्यान देना चाहिए जो कम्युनिटी और लॉन्ग-टर्म एंगेजमेंट पर ज़ोर देते हैं। शेयरधारकों के लिए अगला महत्वपूर्ण अपडेट आने वाले क्वार्टरली रिजल्ट्स में मैनेजमेंट की ओर से मार्केटिंग एफिशिएंसी में बदलाव और उनके डिजिटल फेस्टिव स्पेंडिंग के अप्रोच पर कमेंट्री होगी, खासकर यह कि क्या वे शॉर्ट-टर्म इन्फ्लुएंसर कैंपेन से हटकर सस्टेन्ड, ट्रस्ट-बेस्ड कस्टमर एक्विजिशन की ओर बढ़ रहे हैं।
