फिल्म इंडस्ट्री में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। कम बजट वाली सांस्कृतिक फिल्में बड़े बजट की स्टार-पावर वाली फिल्मों को टक्कर दे रही हैं। अब फिल्म निर्माता अपने मुनाफे को सुरक्षित रखने के लिए इसी 'लीन मॉडल' (lean model) को अपना रहे हैं।
भारतीय फिल्म इंडस्ट्री का फाइनेंशियल मॉडल तेजी से बदल रहा है। अब दर्शकों को बड़े सितारों की जगह दमदार, सांस्कृतिक और रिलिजियस (faith-based) कहानियों से जुड़ी फिल्में पसंद आ रही हैं। यह शिफ्ट फिल्म प्रोडक्शन हाउस को मजबूर कर रही है कि वे अपने बजट आवंटन पर फिर से विचार करें।
प्रोडक्शन का नया 'लीन' गणित
हालिया फिल्में जैसे 'लालो-कृष्ण सदा सहायते' (Laalo-Krishna Sada Sahaayate), 'हनुमान अंश' (Hanuman Ansh) और 'इरुमुडी' (Irumudi) ने दिखाया है कि कम लागत में भी सफलता कैसे हासिल की जा सकती है। इन फिल्मों की लागत ₹2 करोड़ से ₹35 करोड़ के बीच थी, जबकि इन्होंने बॉक्स ऑफिस पर ₹45 करोड़ से ₹140 करोड़ तक का कलेक्शन किया। निवेशकों के लिए यहाँ सबसे बड़ा आकर्षण 'रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट' (ROI) है। बड़े सितारों की भारी-भरकम फीस न होने के कारण इन फिल्मों का 'ब्रेक-ईवन' पॉइंट काफी कम होता है, जिससे मुनाफे की गुंजाइश बढ़ जाती है।
बाजार में क्यों आया यह बदलाव?
दर्शकों की बदलती पसंद इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह है। लोग अब ऐसी कहानियों से जुड़ रहे हैं जो उन्हें सांत्वना और सांस्कृतिक जुड़ाव का अहसास कराती हैं। मार्केटिंग पर भारी खर्च करने के बजाय, ये फिल्में 'वर्ड-ऑफ-माउथ' (word-of-mouth) से चलती हैं, जिससे कंपनी का ऑपरेटिंग मार्जिन सुरक्षित रहता है।
निवेश के साथ जुड़े जोखिम
निवेशकों को यह समझना होगा कि इस जॉनर का प्रदर्शन काफी अनप्रेडिक्टेबल (unpredictable) हो सकता है। ऐसी फिल्मों की शुरुआत अक्सर धीमी होती है, जिसके लिए एग्जीबिटर्स को स्क्रीन अलॉटमेंट को लेकर मुश्किल फैसलों का सामना करना पड़ता है। साथ ही, इन फिल्मों का रेवेन्यू फोरकास्टिंग करना भी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि यह पूरी तरह से दर्शक के जुड़ाव पर निर्भर करता है।
मीडिया और एंटरटेनमेंट सेक्टर में दिलचस्पी रखने वाले निवेशकों के लिए अब यह देखना दिलचस्प होगा कि बड़ी प्रोडक्शन कंपनियां कैसे अपने ट्रेडिशनल ब्लॉकबस्टर मॉडल के साथ इस हाई-मार्जिन वाले 'लीन मॉडल' को बैलेंस करती हैं।
