FSSAI की सख्त चेतावनी के बाद बॉलीवुड एक्टर और इन्फ्लुएंसर्स फूड और बेवरेज ब्रांड्स के साथ एंडोर्समेंट डील रोक रहे हैं। रेगुलेटर ने साफ कर दिया है कि गलत हेल्थ क्लेम के लिए एंडोर्स करने वाले कानूनी तौर पर जिम्मेदार होंगे। इससे कंपनियों की मार्केटिंग स्ट्रैटेजी में बदलाव आ सकता है।
FSSAI के नए नियमों का असर
FSSAI (Food Safety and Standards Authority of India) की 13 अगस्त, 2026 को जारी की गई नई गाइडलाइन्स के बाद बॉलीवुड के सितारे और बड़े इन्फ्लुएंसर्स फूड और बेवरेज कंपनियों के साथ अपने एंडोर्समेंट कॉन्ट्रैक्ट्स को फिर से जांच रहे हैं या फिलहाल रोक रहे हैं।
सेलेब्स पर क्या है कानूनी जिम्मेदारी?
FSSAI ने साफ कर दिया है कि जो सेलेब्रिटीज या इन्फ्लुएंसर्स किसी फूड प्रोडक्ट के बारे में गलत या भ्रामक हेल्थ क्लेम, जैसे कि इम्यूनिटी या न्यूट्रिशनल वैल्यू को लेकर झूठे दावे करते हैं, वे फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट, 2006 के तहत कानूनी कार्रवाई के दायरे में आ सकते हैं।
निवेशकों के लिए क्या है मायने?
यह डेवलपमेंट फास्ट-मूविंग कंज्यूमर गुड्स (FMCG) कंपनियों के लिए एक नई चुनौती पेश कर रहा है। खासकर त्योहारी सीजन, जो कि स्नैक्स, चॉकलेट्स और पैक्ड फूड्स की बिक्री बढ़ाने के लिए सेलेब्रिटी एंडोर्समेंट्स पर बहुत निर्भर करता है, के लिए यह चिंता का विषय है। अगर बड़े स्टार्स कानूनी जोखिम और पब्लिक की नकारात्मक प्रतिक्रिया के डर से नई डील्स साइन करने से कतराते हैं, तो कंपनियों के मार्केटिंग कैंपेन में रुकावट आ सकती है।
ऐसे में, ब्रांड्स को अपनी एडवरटाइजिंग की रणनीति बदलनी पड़ सकती है या फिर उन्हें लीगल ड्यू डिलिजेंस (Legal Due Diligence) पर ज्यादा खर्च करना पड़ सकता है, जिसका सीधा असर उनके मार्केटिंग बजट पर दिख सकता है।
रेगुलेटरी माहौल सख्त
यह पहली बार नहीं है जब इस तरह के मुद्दे उठे हैं। महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (Maharashtra Food and Drug Administration) द्वारा पहले जारी किए गए शो-कॉज नोटिस, खासकर सरोगेट एडवरटाइजमेंट्स (Surrogate Advertisements) के मामले में, पहले ही सख्त प्रवर्तन का संकेत दे चुके हैं। इसके चलते, टैलेंट मैनेजमेंट फर्म्स अब एंडोर्समेंट फीस से ज्यादा कानूनी सुरक्षा और अपनी रेप्युटेशन को अहमियत दे रही हैं।
आगे क्या?
यह डेवलपमेंट भारतीय पैक्ड फूड इंडस्ट्री में ब्रांड बनाने के पारंपरिक तरीके को चुनौती देता है। जो कंपनियां ऐतिहासिक रूप से सेलेब्रिटी-हैवी मार्केटिंग पर निर्भर रही हैं, उन्हें रेगुलेटरी और सोशल बैकलेश से बचने के लिए अपनी अप्रोच पर फिर से विचार करना होगा। शेयरहोल्डर्स (Shareholders) को यह देखना होगा कि FMCG कंपनियां अपनी मार्केटिंग कम्युनिकेशन को कैसे एडजस्ट करती हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कंपनियां बिना हाई-प्रोफाइल एंडोर्समेंट्स के अपनी एडवरटाइजिंग विजिबिलिटी बनाए रख पाएंगी, या फिर कंप्लायंस (Compliance) चेक की बढ़ी हुई जरूरत के कारण ऑपरेशनल कॉस्ट बढ़ेगी, जिससे आने वाली तिमाहियों में मार्केटिंग बजट प्रभावित हो सकता है।
