FMCG कंपनियों के लिए 'मिक्स एंड मैच' विज्ञापन की रणनीति! जानें क्यों ज़रूरी है ROI

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
FMCG कंपनियों के लिए 'मिक्स एंड मैच' विज्ञापन की रणनीति! जानें क्यों ज़रूरी है ROI

एक नई Worldpanel by Numerator स्टडी से पता चला है कि 80% FMCG ब्रांड्स के लिए, अकेले एक चैनल के बजाय टीवी और डिजिटल विज्ञापन का मेल ज़्यादा असरदार है। निवेशकों के लिए यह जानकारी महत्वपूर्ण है क्योंकि FMCG कंपनियाँ बढ़ती विज्ञापन लागत और बदलते उपभोक्ता व्यवहार के बीच मुनाफ़ा बचाने की कोशिश कर रही हैं।

विज्ञापन पर समझदारी से खर्च करें

Worldpanel by Numerator के एक नए विश्लेषण से पता चला है कि फास्ट-मूविंग कंज्यूमर गुड्स (FMCG) ब्रांड्स, अगर सिर्फ टीवी या सिर्फ डिजिटल विज्ञापन पर निर्भर रहते हैं, तो वे बिक्री के बेहतर नतीजों से चूक सकते हैं। Sync Media के साथ साझेदारी में किए गए इस अध्ययन में पाया गया है कि 'हाइब्रिड' यानी मिले-जुले विज्ञापन की रणनीति, किसी एक माध्यम पर ध्यान केंद्रित करने की तुलना में ब्रांड की पहुँच बढ़ाने में कहीं ज़्यादा असरदार है।

विज्ञापन खर्च में एफिशिएंसी

FMCG कंपनियों की मुनाफेदारी पर नज़र रखने वाले निवेशकों के लिए, विज्ञापन पर होने वाला खर्च एक अहम हिस्सा है। कंपनियाँ अपना मार्केट शेयर बनाए रखने के लिए अक्सर मार्केटिंग पर भारी भरकम रकम खर्च करती हैं। इस स्टडी के अनुसार, जाँचे गए 80% ब्रांड्स के लिए, टीवी और डिजिटल प्लेटफॉर्म का मिला-जुला इस्तेमाल, केवल एक माध्यम पर आधारित अभियानों से बेहतर प्रदर्शन कर रहा है।

हालांकि टीवी अभी भी पहुँच बनाने का मुख्य ज़रिया है, लेकिन स्टडी में यह भी पाया गया कि केवल डिजिटल विज्ञापन कुछ ही घरों तक पहुँच पाता है, आमतौर पर 0.6% से 4.1% तक। यह डेटा FMCG कंपनियों के मैनेजमेंट के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है; इसका मतलब है कि भले ही डिजिटल खर्च बढ़ रहा हो, लेकिन यह अभी तक टीवी द्वारा प्रदान की जाने वाली पहुँच का विकल्प नहीं बन सकता। इसलिए, सबसे किफायती रास्ता, जो मुनाफे को सबसे अच्छी तरह सुरक्षित रखता है, वह है दोनों का सावधानीपूर्वक संतुलन।

निवेशकों के लिए यह क्यों मायने रखता है?

मार्केटिंग की लागत, कंज्यूमर गुड्स कंपनियों के लिए बिक्री और वितरण खर्चों का एक बड़ा हिस्सा होती है। ऐसे सेक्टर में जहाँ वॉल्यूम ग्रोथ हासिल करना मुश्किल होता है, मार्केटिंग एफिशिएंसी सीधे बॉटम लाइन को प्रभावित करती है। अगर कंपनियाँ इस हाइब्रिड मॉडल को अपनाकर अपने विज्ञापन खर्च को अनुकूलित कर सकती हैं, तो वे शायद अपने मार्केटिंग बजट को बढ़ाए बिना बिक्री के बेहतर नतीजे हासिल कर पाएँगी।

इसके अलावा, यह स्टडी 'डिजिटल शेल्फ' की बढ़ती जटिलता को भी उजागर करती है। जैसे-जैसे भारत में क्विक कॉमर्स और ऑनलाइन शॉपिंग का चलन बढ़ रहा है, FMCG कंपनियों पर विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर अपने विज्ञापन खर्च को अनुकूलित करने का दबाव है। निवेशकों को विज्ञापन ROI (रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट) और यह देखना चाहिए कि कंपनियाँ उपभोक्ताओं तक पहुँचने के लिए अपने मीडिया मिक्स को कैसे विकसित कर रही हैं, खासकर पर्सनल केयर, होम केयर और फ़ूड प्रोडक्ट्स जैसे तेज़ी से बढ़ते सेगमेंट में।

जोखिम और बाज़ार का संदर्भ

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि यह स्टडी रणनीतिक अंतर्दृष्टि प्रदान करती है, लेकिन विज्ञापन बजट व्यापक आर्थिक माहौल के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं। यदि उच्च मुद्रास्फीति या भू-राजनीतिक अनिश्चितता जैसे कारकों के कारण उपभोक्ता भावना कमजोर होती है, तो FMCG कंपनियाँ विवेकाधीन विज्ञापन खर्च में कटौती कर सकती हैं, जिससे मीडिया और विज्ञापन एजेंसियों के राजस्व में अस्थायी रूप से कमी आ सकती है। इसके अतिरिक्त, मीडिया मापन अभी भी जटिल है; जैसे-जैसे उपभोग की आदतें बदलती हैं, ब्रांडों को यह सुनिश्चित करने के लिए अपनी रणनीतियों को लगातार अनुकूलित करना होगा कि उनका मार्केटिंग खर्च केवल दृश्यता के बजाय वास्तविक उत्पाद खरीद में तब्दील हो।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.