FIFA World Cup India Rights: ₹300 करोड़ की डील अटकी! FIFA और खरीदारों के बीच छिड़ी जंग

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
FIFA World Cup India Rights: ₹300 करोड़ की डील अटकी! FIFA और खरीदारों के बीच छिड़ी जंग
Overview

FIFA के लिए भारत में 2026 वर्ल्ड कप के ब्रॉडकास्ट राइट्स बेचना मुश्किल हो गया है। कंपनी को डील के लिए खरीदारों से मन मुताबिक दाम नहीं मिल पा रहे हैं, जिससे बातचीत रुक गई है। FIFA जहाँ **$35 मिलियन (करीब ₹290 करोड़)** से ज़्यादा की उम्मीद कर रहा है, वहीं संभावित खरीदार लगभग **$20 मिलियन (करीब ₹165 करोड़)** की पेशकश कर रहे हैं। यह 2022 के राइट्स से **$60 मिलियन (करीब ₹500 करोड़)** के मुकाबले काफी कम है।

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कीमत का बड़ा अंतर, डील अटकी

FIFA के लिए भारत में 2026 वर्ल्ड कप के ब्रॉडकास्ट राइट्स के लिए बड़ा प्राइस वॉर (Price War) छिड़ा हुआ है। फुटबॉल की यह टॉप बॉडी 2026 और 2030 के टूर्नामेंट्स के बंडल्ड राइट्स के लिए $35 मिलियन (लगभग ₹290 करोड़) से ज़्यादा की मांग कर रही है। लेकिन, मार्केट की मौजूदा हालत को देखते हुए, खरीदार इस कीमत से कोसों दूर हैं। रिपोर्टों के अनुसार, रिलायंस-डिज़्नी ज्वाइंट वेंचर JioStar लगभग $20 मिलियन (लगभग ₹165 करोड़) की पेशकश कर रहा है। वहीं, Sony ने इस डील से किनारा कर लिया है क्योंकि उन्हें यह सौदा किफायती नहीं लग रहा।

यह प्राइस गैप (Price Gap) FIFA की उम्मीदों और भारतीय मीडिया मार्केट की हकीकत के बीच का एक बड़ा अंतर दिखाता है। आपको बता दें कि FIFA की लगभग 90% कमाई ब्रॉडकास्ट रेवेन्यू (Broadcast Revenue) से आती है, और 2026 इवेंट के लिए यह $3.9 बिलियन (लगभग ₹32,000 करोड़) तक पहुंचने का अनुमान है।

भारतीय मीडिया मार्केट में आई नरमी

2022 के बाद से भारतीय मीडिया मार्केट में काफी बदलाव आया है। अब यह तेज़ी से ग्रोथ की बजाय प्रॉफिटेबिलिटी (Profitability) पर ज्यादा फोकस कर रहा है। ऐसे में एडवरटाइजिंग मार्केट (Advertising Market) का कमजोर होना और बड़े रेगुलेटरी बदलावों ने स्थिति को और खराब कर दिया है।

उदाहरण के लिए, अगस्त 2025 से रियल-मनी गेमिंग (Real-money gaming) ऐड्स पर लगने वाले बैन से सालाना ₹4,500 करोड़ ($540 मिलियन) का एडवरटाइजिंग खर्च खत्म होने का अनुमान है। इस बैन ने गेमिंग सेक्टर को बुरी तरह प्रभावित किया है और स्पोर्ट्स एडवरटाइजिंग में एक बड़ा गैप छोड़ दिया है। इसके अलावा, जनरल इकोनॉमिक अनिश्चितता (economic uncertainty) और सरकारी नीतियों ने विज्ञापनदाताओं के लिए एक जटिल माहौल बना दिया है।

मीडिया कंपनियों पर अब प्रॉफिट दिखाने का भारी दबाव है, जिसके चलते वे महंगी स्पोर्ट्स राइट्स खरीदने में बहुत ज़्यादा सतर्क हो गई हैं। Sony India का नेट प्रॉफिट FY25 में 6% घट गया, भले ही रेवेन्यू बढ़ा हो, क्योंकि एडवरटाइजिंग खर्च बढ़ा था।

क्रिकेट का दबदबा

भारत में फुटबॉल की बड़ी डिजिटल व्यूअरशिप (digital viewership) के बावजूद, लगभग 305 मिलियन (30.5 करोड़) फैंस होने के बावजूद, विज्ञापनदाताओं के लिए इसका आकर्षण क्रिकेट के आगे बहुत कम है। क्रिकेट भारत की स्पोर्ट्स इकोनॉमी (sports economy) के रेवेन्यू का लगभग 89% हिस्सा है, जो स्पॉन्सरशिप (sponsorship), एंडोर्समेंट (endorsements) और मीडिया खर्च पर हावी है। विज्ञापनदाता आज भी क्रिकेट को ज़्यादा महत्व देते हैं और फुटबॉल को इसकी ऑनलाइन पॉपुलैरिटी के बावजूद एक निश (niche) स्पोर्ट मानते हैं।

2026 वर्ल्ड कप के शेड्यूल में एक और चुनौती है: उत्तरी अमेरिका के टाइम जोन (time zones) के कारण भारत में कई अहम मैच आधी रात के बाद ही शुरू होंगे, जिससे प्राइम-टाइम टीवी एडवरटाइजिंग के मौके सीमित हो जाएंगे। इसके अलावा, क्रूशियल नॉकआउट स्टेज (knockout stages) भारत के बिजी क्रिकेट कैलेंडर के साथ लिमिटेड एड बजट के लिए प्रतिस्पर्धा करेंगे, जो क्रिकेट के कमर्शियल लीड को और मज़बूत करता है।

मीडिया कंसॉलिडेशन (Media Consolidation) ने घटाई बिडर्स की संख्या

भारत के स्पोर्ट्स मीडिया स्पेस में बड़ा कंसॉलिडेशन (consolidation) देखने को मिला है, खास तौर पर नवंबर 2024 में Reliance के Viacom18 और Disney India के Star India का JioStar में मर्जर। इस ज्वाइंट वेंचर (joint venture) के पास अब इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) और ICC क्रिकेट टूर्नामेंट्स समेत भारत की सबसे कीमती स्पोर्ट्स प्रॉपर्टीज़ का बड़ा हिस्सा है। जब बड़े खिलाड़ी कम होते हैं, तो FIFA के पास मोलभाव करने की ताकत (leverage) कम हो जाती है।

IPL के लिए पहले देखी गई आक्रामक बिडिंग वॉर (bidding war) FIFA राइट्स के लिए होने की संभावना कम है। यह कंसॉलिडेशन घटी हुई पेशकशों में योगदान देता है, क्योंकि मुख्य खरीदार (JioStar) के पास बाज़ार में काफी दबदबा है और वह अपने बड़े पोर्टफोलियो में प्रॉफिट को ऑप्टिमाइज़ (optimize) करने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। Disney के इंडिया ज्वाइंट वेंचर ने Q1 FY26 में $28 मिलियन (लगभग ₹230 करोड़) का लॉस रिपोर्ट किया, जो इन मीडिया दिग्गजों पर वित्तीय दबाव को दिखाता है।

FIFA के लिए मुख्य रिस्क (Risks)

FIFA के लिए सबसे बड़ा रिस्क यह समझना है कि भारत में भारी डिजिटल व्यूअरशिप (digital viewership) अपने आप हाई एडवरटाइजिंग रेवेन्यू (advertising revenue) में तब्दील नहीं होती, खासकर क्रिकेट के स्थापित कमर्शियल वैल्यू की तुलना में। 2026 वर्ल्ड कप की देर रात की ब्रॉडकास्ट टाइमिंग (broadcast timings) टीवी एडवरटाइजिंग को मोनेटाइज (monetize) करने में एक बड़ी बाधा है। इसके अलावा, रियल-मनी गेमिंग ऐड्स पर बैन से पैदा हुए बड़े गैप ने विज्ञापनदाताओं को अपने खर्च पर फिर से विचार करने पर मजबूर कर दिया है।

अगर FIFA भारत में ब्रॉडकास्ट पार्टनर हासिल करने में नाकाम रहती है, तो उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के लिए उसकी रणनीति पर सवाल खड़े होंगे। JioCinema का HBO, Max और NBCUniversal कंटेंट को आक्रामक तरीके से हासिल करना, स्पोर्ट्स राइट्स की कीमत पर एक प्रीमियम स्ट्रीमिंग सर्विस बनाने की स्पष्ट योजना दिखाता है, अगर इकोनॉमिक्स (economics) सही न हों। NFL या NBA जैसी लीग्स की तुलना में, जो अपने बाज़ारों में मजबूत वित्तीय स्वास्थ्य में हैं, FIFA की ब्रॉडकास्ट राइट्स पर निर्भरता इस भारतीय बातचीत की विफलता को विशेष रूप से प्रभावशाली बनाती है।

दिल्ली हाई कोर्ट में एक पिटीशन (petition) टूर्नामेंट के टेलीकास्ट (telecast) को सुनिश्चित करने के लिए दायर की गई है, जो जनता की रुचि को दर्शाता है लेकिन FIFA के लिए कोई वित्तीय लाभ नहीं है।

आगे की राह

हालांकि आखिरी मिनट में कोई डील संभव है, लेकिन मौजूदा बातचीत से यही लगता है कि FIFA को भारत के लिए अपनी कीमत की उम्मीदों को काफी कम करना होगा। यह स्थिति स्पोर्ट्स मीडिया इकोनॉमिक्स (sports media economics) में एक मुख्य बदलाव को उजागर करती है: उभरते बाज़ारों में बड़े डिजिटल ऑडियंस (audiences) असीमित ग्रोथ की गारंटी नहीं देते। ब्रॉडकास्टर्स, जो अब बड़े एसेट्स (assets) के मालिक हैं और प्रॉफिट पर केंद्रित हैं, शर्तें तय कर रहे हैं। FIFA के लिए, भारत का परिणाम एक महत्वपूर्ण केस स्टडी (case study) होगा, जो अन्य उभरते बाज़ारों में राइट्स सुरक्षित करने के प्रति उसके दृष्टिकोण को प्रभावित कर सकता है और राइट्स होल्डर्स (rights holders) और मीडिया कंपनियों के बीच शक्ति के बदलते संतुलन को दिखा सकता है।

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