मीडिया इंडस्ट्री के दिग्गज केविन वैज ने I&B मंत्रालय से BARC रेटिंग्स को फिर से शुरू करने का आग्रह किया है। यह कदम **₹2.78 लाख करोड़** के भारतीय मीडिया सेक्टर में अनिश्चितता को दूर करने और विज्ञापन खर्चों में पारदर्शिता लाने के लिए उठाया गया है।
भारतीय मीडिया और एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री इस समय डेटा की कमी से जूझ रही है, जिसका सीधा असर विज्ञापन निवेश पर पड़ रहा है। FICCI की मीडिया एंड एंटरटेनमेंट कमेटी के चेयरमैन केविन वैज ने औपचारिक रूप से सूचना और प्रसारण मंत्रालय से BARC रेटिंग्स को बहाल करने की अपील की है। इंडस्ट्री का मानना है कि विश्वसनीय व्यूअरशिप डेटा के बिना कंपनियां सही ढंग से कैंपेन की योजना नहीं बना पा रही हैं, जिससे पूंजी के आवंटन (capital allocation) में दिक्कत आ रही है।
विज्ञापन खर्च और डेटा की अनिश्चितता
मीडिया स्टॉक्स पर नजर रखने वाले निवेशकों के लिए विज्ञापन से होने वाली कमाई मुनाफे का सबसे अहम पैमाना है। रेटिंग सिस्टम के न होने से ब्रॉडकास्टर्स अपनी कीमतों को सही ठहराने में संघर्ष कर रहे हैं। जैसे-जैसे इंडस्ट्री डिजिटल-फर्स्ट और कनेक्टेड टीवी (CTV) की ओर बढ़ रही है, पारदर्शिता की कमी से बजट का सही अनुमान लगाना मुश्किल हो गया है।
मीडिया की बदलती चाल
भारतीय मीडिया और एंटरटेनमेंट सेक्टर का वैल्युएशन साल 2025 में ₹2.78 लाख करोड़ तक पहुंच गया है, जो पिछले साल के मुकाबले 9% की बढ़त है। इसमें डिजिटल सेगमेंट का योगदान ₹1.1 लाख करोड़ से ज्यादा है। कनेक्टेड टीवी का व्यूअरशिप बेस 20 करोड़ लोगों तक पहुंच चुका है, जहां 80% से ज्यादा उपयोग सोशल और शेयर्ड व्यूइंग का है।
नए ग्रोथ इंजन और भविष्य
परंपरागत विज्ञापन से इतर, कंपनियां अब कंटेंट कॉमर्स और माइक्रो-ड्रामा जैसे नए रास्तों को तलाश रही हैं। माइक्रो-ड्रामा सेगमेंट, जो 2025 में ₹650 करोड़ का है, 2028 तक 50% से ज्यादा की सालाना दर से बढ़ने का अनुमान है। साथ ही, प्रोडक्शन में AI का इस्तेमाल भी तेजी से बढ़ रहा है। ब्रॉडकास्टर्स के लिए 10+2 विज्ञापन कैप में ढील को सकारात्मक माना जा रहा है, लेकिन मार्केट में स्थिरता के लिए BARC रेटिंग्स की वापसी सबसे महत्वपूर्ण फैक्टर बनी हुई है।
